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________________ P.P.AC.Gurranasuri MS. उत्तम हुषा झि पिता-पुत्र में विरोध हो गया। अब प्रद्युम्न अवश्य ही मेरे सङ्ग द्वारिका गमन हेतु प्रस्तुत हो / जायेगा।' नारद ने आशीर्वाद देते हुए जिज्ञासा की-'यहाँ युद्ध क्यों हो रहा है ?' प्रद्युम्न नै–'हे प्रभु! माता के शिक्षाभियोग पर विश्वास कर बिना विचारे ही पिताश्री ने रोखा घोर अनर्थ किया है। इसके पश्चात् प्रद्यम्न ने माता कनकामाला का समस्त षडयन्त्र पिता को भी बसलाया। नारदमी घटनाक्रम सुन रहे थे। उन्होंन कहा-'हे वत्स! जब रहने दे. परगापिनी नारियों के चरित्र का श्रवण मात्र भी पाप का बन्ध है! वे पति-पत्र-भ्राता एवं गुरु का प्रासनाश करने में भी नहीं हिचकीं।' नारद का उपदेश सन कर प्रद्युम्न नेकहा-'प्रभु! मैं गुरुजनों के स्नेह से रहित हो गया। अब मैं किसके निकट जाऊँ? यद्यपि कालसंवर मेरे पिता हैं एवं कानमाला मेरी पाता; किन्तु उन्होंने मेरे साथ घोर अन्याय किया है। अतएव बतलाइये कि मैं किसकी शरण में जाऊँ?' नारद कहने लगे-'हे वत्स ! दुःखी मत हो ! मैं तुम्हें समस्त वृत्तान्त सुनाता हूँ ! तेरे पिता तो स्वयं नारायण श्रीकृष्ण हैं / वै यादों के शिरोमणि रक इरिवंश-कुलभूषण हैं। द्वारिका की पटशन्नो रुक्मिणो तेरी माता है। उन लोगों ने मादरपूर्वक तमे लाने के लिए मझे भेजा है। तुम्हें बुलाने का एक कारण अन्य भी है, जिसे मैं कहता हूँ। अतः धान दे कर सुनो-तेरी माता तथा सत्यमामा (उसको सौत) में बड़ा विरोध है। इसलिये मेरे सङ्ग ही प्रस्थान करना उचित होगा।' अपनी वंशगाथा सन कर प्रद्यम्न को पूर्ण सन्तोष हुआ। उसमें नारद के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न हुई। प्रद नने पालक पिताश्री कालसम्बर को मुक्त कर दशा एवं साथ ही समस्त सैन्य को चैतन्य कर दिया। उस समय ग्लानिधश कालसम्वर 2 को प्रद्युम्न को कुछ कह सकते थे एवं न ही नारद मुनि से। वे निःशब्द अपने नगर में लौट आय। उन्होंने कमकमाला से जा कर कहा-'हे प्रिये,इसमें तेरा कोई दोष नहीं। यह सब हमारे कर्मों का फल है।' कालसम्बर एवं रानी इधर वार्तालाप कर रहे थे कि उनके पञ्च-शतक पुत्र आ पहुँचे। उन्हें कुमार ने वापिका से मुक्त कर दिया था। सारे नगर में कनकमाला की दुश्चरित्रता की कथा फेल गयी। इसीलिये कहा जाता है कि पाप गुप्त नहीं | रह पाता। पापी त्रिकाल में भी विजयी नहीं होते, धर्मात्माओं की ही सदा अन्त में जय होती है। अतएव सत्परुषों को उचित है कि वे पाप का सर्वथा परित्याग कर दें। पुण्य के प्रभाव से ही मनुष्य सुखी होता है।। Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036468
Book TitlePradyumna Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomkirti Acharya
PublisherJain Sahitya Sadan
Publication Year2000
Total Pages200
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size275 MB
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