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________________ PP Ad Gunanasuri MS रचना कर डाली। दोनों सेनायें परस्पर संग्राम रत हुईं। दोनों ओर से तुमुल संघर्ष होने लगा। कौतुक-प्रिय नारद मुनि तब आकाश-मार्ग में हर्ष से नृत्य करने लगे। ___जब प्रद्युम्न की कठिन युक्ति से कालसम्बर की सेना का विनाश होने लगा, तब वह चिन्तित हो उठा। उस || 126 समय उसे एक युक्ति सूझी। उन्होंने मन्त्री से कहा-'देखो! तुम तब तक किसी प्रकार युद्ध करते रहो, जब तक मैं रानी से दो विद्याएँ लेकर न आ जाऊँ। उनके प्रयोग से शत्रु शीघ्र परास्त हो जायेगा।' युद्ध की समस्त व्यवस्था मन्त्री को सौंप कर मन्द बुद्धि कालसम्वर नगर में गया तथा रानी से बोला-'हे प्रिये ! तुम्हारे पास रोहिणी तथा प्रज्ञप्ति नामक दो अमोघ विद्याएँ हैं, उन्हें मुझे दे दो। मैं शत्रु को परास्त कर तेरी मनोकामना पूर्ण करूँगा।' इतना सुनते ही कनकमाला फूट-फूट कर विलाप करने लगी। राजा को सन्देह हा। उन्हें निश्चय हो गया कि इस व्यभिचारिणी ने विद्यायें किसी को दे दी हैं। पनः विचार कर कालसंवर ने कहा-'हे प्रिये। त क्यों विलाप करती है ? यह समय सर्थ गवाने का नहीं है. शत्र बलवान है।' वह रुदन करती हुई बोली- 'हे नाथ! उस पापी ने मुझे कई बार ठगा है। मैं ने विचार किया था कि वृद्धावस्था में इसके द्वारा हमें सुख मिलेगा। इसलिये मैं ने दोनों विद्याओं को अपने उरोजों में प्रविष्ट करा कर उसे शैशवावस्था में पान करा दिया था। मुझे ज्ञात नहीं था कि युवावस्था में वह ऐसा पापी निकलेगा ? हे नाथ ! मैं तो दोनों ओर से भ्रष्ट हो गयी।' इतना कह कर वह कृत्रिम विलाप करने लगी। किन्तु कालसम्बर को उसके कथन पर विश्वास नहीं हुआ। अब कनकमाला की दुश्चरित्रता उस पर प्रकट हो गयी। उन्होंने विचारा-'इस दुष्टा के कारण मैं ने दुर्लभ विद्यायें भी खो दों एवं प्रतापी पुत्र-रत्न बी गँवा दिया। ऐसी स्थिति में इस जीवन का क्या प्रयोजन ? अब रणक्षेत्र में वीरभति प्राप्त करना ही सर्वश्रेष्ठ होगा।' ऐसा विचार कर कालसम्वर महल से सीधा रणांगण में कालसंवर का चित्त सन्तप्त तो था ही, उसने बड़े वेग से शर-प्रहार (बाण चलाना ) प्रारम्भ कर दिया। विवश होकर कुमार ने भी एक वेगशाली 326 बाण चलाशा, जिसने कालसंबर को ससैन्य नागपाश में बाँध लिया। किंतु अब प्रद्युम्न को बड़ा सङ्कोच एवं पश्चात्ताप | हो रहा था। उस समय वह यही कामना कर रहा था कि कोई महापुरुष जा कर उसके पिता को बन्धनमुक्त करवा दे। होनहार व्यर्थ नहीं जाती। उसी समय नारद मुनि पधारे। उन्होंने जोचा-'यह तो अति Jun Gun Anak Us नायMSTH
SR No.036468
Book TitlePradyumna Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSomkirti Acharya
PublisherJain Sahitya Sadan
Publication Year2000
Total Pages200
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size275 MB
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