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________________ परमात्मा की शपथ लेकर, कर्तव्यनिष्ठ राजदूत अपने मालिक से थोड़ा लेकर उसके बदले चार गुणा ज्यादा कार्य करेगा। राजवटुक बड़ा भारी चालाक था, उसकी आंखों से कोई भी गुन्हेगार छुप नहीं सकता था, अनुमान लगाकर कार्य का निर्णय करने में वह बड़ा भारी दक्ष था। राजाजी की आज्ञा स्वीकार कर अपने घर पर आया और घड़ी-आध-घड़ी आंखें बंद करके सोचने लगा कि, राज्यभ्रष्ट नलदमयंती को लगभग 11 वर्ष होने आये हैं, पृथ्वी विशाल है, अगणित देश हैं, चारों दिशाएँ खुली पड़ी है, ऐसी स्थिति में आपत्तिग्रस्त इन्सान कहीं भी जाने में स्वतंत्र है / मैं कौन-सी दिशा में जाऊँ ? जिससे अविलम्ब कार्यसिद्धि होकर मुझे यश मिलने पावे। शास्त्रकारों ने कहा, इन्सान ! चमड़े की आंखें तो भी धुंधली हो सकेगी परंतु अनुमान की आंखें हमेशा जागृत रहती है। - नलदमयंती की खोज में राजबटुक का प्रस्थान कर्तव्यनिष्ठ इन्सान का अनुमान सत्यलक्षी होने से अपने मालिक के कार्य पूर्ण करने में देर नहीं लगती है। प्रारंभ में तो वह बटुक इधर-उधर खूब फिरा, परंतु बनवासी बने हुए नलदमयंती के कुछ भी समाचार कहीं पर से भी जब नहीं मिलने पाये, तब उसने अचलपुर नगर का मार्ग लिया और नगर में प्रवेश कर सीधा राजमहल में आया जहां पर ऋतुपर्ण राजा और चन्द्रयशा रानीजी तथा और भी जनता स राजदरबार भरा हुआ था / (इतना याद रखना होगा कि, चन्द्रयशा रानी तथा भीमराजा की पुष्पदंती (दमयंती की माता) सगी बहन है, और दमयंती इस समय अपनी मौसी चन्द्रयशा के यहां दासी रुप में समय बीता रही है / ) अपने पितृगृह से आये हुए हरिमित्र राजवटुक को देखकर चन्द्रयशा रानीजी को खुशी होना स्वाभाविक है, और उसी खुशी के कारण रानीजी ने एक ही साथ प्रश्न के ऊपर प्रश्न पूछे, "भीम P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036461
Book TitleNal Damayanti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnanandvijay
PublisherPurnanandvijay
Publication Year1990
Total Pages132
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size90 MB
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