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________________ / ते प्रोचुर्नाऽपरं विद्यो, विशेषं किन्तु सगरे / . अवध्यामहि दुर्बुद्धया, युध्यमानाः स्वयं वयम् // 81 // ........ भावार्थ-त्यारे सर्व राजाओए प्रत्युत्तर आप्यो के–अमे आम बनवार्नु बाजु तो काइ विशेष कारण जाणता नधी, परंतु दुष्टबुरिथी युद्ध करता अमे रणांगणमा स्वयमेव बंधाइ गया छीए // 81 // परं भवत्प्रसादेन, च्छुटिता नात्र संशयः। (32 // . . अतः स्वसेवकान् यावज्जीवं स्वीकुरु नोऽधुना // 82 // .... भावार्थ-परंतु हे राजन् ! आपनीज कृपादृष्टिथी अमे छुट्या छीए, एमां संचय नथी. माटे हवे आप अौ || सर्वने जीवंत पर्यंत पोताना संवकपणे स्वीकारो // 82 // ... .. इत्युत्तवा सेवकीभूत-स्तैरेवाऽसौ परिवृतः। .. स्वपुरं प्राविशत् प्राज्य--प्रवेशोत्सवपूर्वकम् / / 83 // ... भावार्थ-आवी रीते. सेवक तरीके पोताने वश थयेल सर्व राजाओथी परिवरेल ते समुद्रपाल राजाए मोटा ! उत्सवयुक्त पोताना नगरमा प्रवेश कयों // 83 // . . PP A. Gunratniasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036457
Book TitleNabhak Raj Charitram Bhashantar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMerutungasuri
PublisherDosabhai Lalchand Shah
Publication Year
Total Pages108
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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