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________________ सान्वय | भाषांतर चरित्र द्विपृष्ट || छिन्नायुधभुजामौलिः कश्चिदुत्पत्य कोपतः / ऊरुसंदंशबन्धेन द्विषमाशु व्यसुं व्यधात् // 17 // ___ अन्वयः-छिन्न आयुध भुजा मौलिः कश्चित् कोपतः उत्पत्य ऊरु संदंश बंधेन द्विषं आशु व्यसुं व्यधात्. // 17 // अर्थः-शस्त्रथी छेदाइ गया छे हाथ तथा मस्तक जेना एवा कोइक सुभटे क्रोधथी उछळीने, शत्रने (पोताना ) के साथकोरूपी // 35 // साणसामां दाबीने तुरत पाणरहित कर्यो. // 17 // कोऽप्यभ्युत्थापयन्नङ्गान्याजिकण्डूभरच्छिदे / प्रहारान्दृढयामास रिपोर्मन्दप्रहारिणः // 18 // अन्वयः-कः अपि आजि कंडू भर च्छिदे अंगानि अभ्युत्थापयन् मंद महारिणः रिपोः प्रहारान् दृढयामास.॥१८॥ अर्थः–कोइक सुभटे तो संग्रामनी खरजनो समूह मटाडवामाटे, (पोतानां) अंगो आगळ धरीने, धीमेथी प्रहार करता शत्रुना | महारोने मजबूत बनाव्या. // 18 // दृक्पातेनैव निर्भग्ने परवीरगणेऽपरः / अपूर्णयुद्धाभिप्रायोऽभजत्प्रायोपवेशनम् // 19 // अन्वयः-दृक् पातेन एव पर वीर गणे निर्भग्ने अपरः, अपूर्णयुद्ध भभिप्रायः प्राय उपवेशनं अभजत्. // 19 // अर्थः-फक्त (पोताना) दृष्टिपातथीज शत्रुना सुभटोनो समूह नाशी जवाथी कोइक सुभटने तो संग्रामनी इच्छा पूर्ण न थवाथी बेसीज रहेQ पडयु. // 19 // GANGANAGARUNCATEGRA P.P.AC.Gunratnasur M.S. un Gun Aaradhak Trust
SR No.036438
Book TitleDvipushta Vasudev Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1929
Total Pages50
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size43 MB
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