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________________ द्विपृष्ट चरित्रं सान्वय 6 भाषांतर // 15 / / 5 क्तिराजए ग्रहण करी. // 47 // / सर्वतः पर्वतः सोऽथ गर्वतः प्रच्युतः कृती। भेजे संभवसूरिभ्यो भवसौरभ्यमुग्नतम् // 48 // . अन्वयः-अथ सर्वतः गर्वतः प्रच्युतः सः कृती पर्वतः संभवमूरिभ्यः भव सारभ्यमुक् व्रतं भेजे. // 48 // अर्थः-पछी सर्व प्रकारना गर्वथी रहित थयेला ते कृतार्थ पर्वतराजाए संभवनामना आचार्यपासे संसारजी वासनाने तजनारं द चारित्र ग्रहण कयु.॥४८॥ विन्ध्यशक्तिवधे शक्तिर्भवतान्मे भवान्तरे / ईग्निदानध्यानेन तेने तेनातुलं तपः // 49 // ___ अन्वयः-भवांतरे विध्यशक्ति वधे मे शक्तिः भवतात् ? ईग् निदान ध्यानेन तेन अतुलं तपः तेने. // 49 / / अर्थः-भवांतरमा आ विंध्यशक्तिराजानो वध करवामां मारी शक्ति थाओ? एवी रीतना नियाणायुक्त ध्यानथी ते पर्वतराजा अनुपम तप तपवा लाग्यो. // 49 // एवं तपः स विक्रीय तक्रैः कामगवीमिव / गृहीत्वानशनं मृत्वा प्रप्रेदे प्राणतं दिवम् // 50 // ___ अन्वयः-एवं तत्रैः काम गवीं इव, तपः विक्रीय सः अनशनं गृहीखा, मृखा प्राणतं दिवं प्रपेदे. // 50 // Pil अर्थः-एरीते छाशसाटे कामधेनुनीपेठे तप वेंचीने, ते अनशन लेइ, मृत्यु पामीने प्राणत देवलोकमां गयो. // 50 // 3 विन्ध्यशक्तिरपि भ्राम्यन्भवाञ्जन्मनि कुत्रचित् / जिनलिङ्गधरो मृत्वा कल्पवृन्दारकोऽभवत् // 51 // 28GANESS P.P.AC.Gunramasur M.S. Jun Gun Aaradhak.Trust
SR No.036438
Book TitleDvipushta Vasudev Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1929
Total Pages50
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size43 MB
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