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________________ धर्म | दणः समवस्थितिस्वरूपो विरोधो विपर्यस्तदा तदत्तथानापि प्रस्तुते विज्ञेयो वेदितव्यः सुखवांग्योः शर्मेबयोः // 1 // एतदेव दर्शयति-वांछा स्पृहा चेद्यदि न मुखं नैव शर्म जंतोदेहिनः, तदिना वांगविरहे शर्म सातं संततमविलेदं, एतदेव निगमयति-न नृतानि न जातानि, न नावीति न जविष्यंति, जपलदाणत्वान्न जति च सुखानि सातानि सार्ध वांच्या स्पृहया. // 5 // सांप्रतं सं. तोषफलमुपदर्शयन संतोषाधिकारमुपसंहरन्नाह__| मूलम् ॥-संतोषसुखशय्यायां / सद्विवेकपटावृताः // स्वपंति ये महात्मानः / शेरते ते निराकुलाः // 1 // व्याख्या-संतोषसुखशय्यायां निरीहतामृदुपर्य के सदिवेकपटावृता निर्मलबोधपटावृता निर्मलबोधपटावगुंचिताः स्वपंति स्वापं विदधति ये केचन महात्मानो महापुरुषाः शेरते खपंति ते नरा निराकुला निरौत्सुक्या इति. // 1 // तदेवंविधविविधामलगुणकलापन्नाजो जति संतोषकारिणो जनाः, ये सर्वत्रैवासंतुष्टचेतसो जवंति ते परद्रव्यार्थिनः संतो व्यापादयंति प्राणिनः, वदंति मृषावाद, रचयंति कूटकपटानि, वंचयंति मित्रमंमलानि, दुह्यंति निरंतरं स्नेहपरानपि निजक | गुरुजनबंधुसंबंधिनः, पारंनयंति महारंनान् , मुष्णंति परद्रव्याणि, कुर्वति न्यासापहार, लोपति Jun Gun Aaradhak Trust P.P.Ac:Gunratnasuri M.S.
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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