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________________ धर्म | पेतः / सर्वशीलांगधारकः // 4 // त्रिनिर्विशेषकं // षण्मासांते ततस्तस्य / ज्ञानमुत्पन्नमुत्तमं / / शमा घातिकर्मदये जाते / लोकालोकावनासकं // 10 // तश्च अस्ति राजगृहस्येह / श्रावस्त्याश्च महापुरः / / दुष्टश्चापदसंकीर्णा–पांतराले महावी // 11 // 360 | तस्यामिकडसंझानां / चौराणां शतपंचकं // अस्त्येतत्प्रतिबोधार्थ / तदंतः कपिलो गतः // 5 // दृष्टः शाखिगते नैष / दस्युना मुनिपुंगवः // श्रमणोऽयं समायाति / शेषाणां च निवेदितं // 13 // ततस्ते तं समादाय / निन्युश्चौराधिपांतिकं // तेनापि स मुनिः प्रोक्तो। नृत्यतां नृत्यतां मुने / // 24 // तेषां विज्ञाय म झान-चक्षुषा मोदाकारणं // श्वमेव ततः प्राह / वादको जो न वि. द्यते // 55 / / केलिना मिलिताः सर्वे / तालाः कुटुंति दस्यवः // तेषां मध्यगतः साधु-धुवकं यागतीदृशं // 26 // अधुवे असासयंमि / संसारमि दुकपनरए / किं नाम होऊ तं कम्मं / जे णाहं दुग्गडून गोळा // 17 // एवं जागवतोजीते / तेऽपि गायति दस्यवः // तालाश्च कुट्टयं त्युच्चैः / सानंदाः समचेतसः // 50 // एवमुङ्गीतिकाव्याजा-दनित्यत्वं प्रकाशयन् // सम्यक्संबोध्य तान् सर्वान् / दीदयामास सन्मुनिः // 55 // ततस्ते साधवो जाताः / साधुसद्गुणधारिणः // Jun Gun Aaradhak Trust P.P.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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