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________________ 326/ धर्म- महामाः // 1 // व्याख्या-बायया सुखयंत्यन्यं, गयया यातपाजावलदाणया सुखयंति सुखिनं | कुर्वत्यन्यं स्वव्यतिरिक्त, सहते स्वयमातपं, सहते मर्षयंति स्वयमात्मना तपमोष्ण्यं, पुष्पंति च | परस्यार्थे, विकसति च परस्यार्थे धात्मव्यतिरिक्तस्य प्रयोजनाय, फलंति च फलवंतो जवति च प| रस्यार्थ इति संबंधः, ते महाडमा वृदा इति. // 1 // ननु खोदरचरणमेव संगतं, किमन्येनेत्याह|.. // मूलम् ॥-खोदरं त्रियते कष्टा-दिनांते वायसैरपि / परार्थकरणासक्तो / यो जीवति स जीवति // 1 // व्याख्या-म्बोदरं खकीयमुदरं जठरं वियते पूर्यते कष्टाद्दुःखादिनांते दिनमध्ये वायसैरपि काकैरपि, परं ते जीवन्मृतकाः, यतोऽन्यधायि-जीवंतो मृतकाः पंच / श्रूयंते किल नारते // दरिद्रो व्याधितो मूर्खः / प्रवासी नित्यसेवकः // 1 // श्रतः परार्थकरणासक्तः परप्रयो. जननिष्पादनसमर्थो यो जोवति यः सत्पुरुषो जीवति प्राणान् धारयति स एव जीवति, शेषा जी. वन्मृतका इति. // 1 // सांप्रतं सत्पुरुषाणामेव मे धैः सहोपमानमाह // मूलम् ।।-क्वेशेनोपाय॑ वित्तानि / ददुर्धर्मे नरोत्तमाः // यथा लोकोपकाराय / पयः पी | त्वा पयोधराः // 1 // व्याख्या-क्लेशेनोपाय॑ वित्तानि क्लेशेन जुःखेनोपार्जयित्वा च वि. | Jun Gun Aaradhak Trust P.P.AC.GunratnasuriM.S.
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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