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________________ धर्मः शिष्टाचारविनिर्मुक्ता / यथाकामविचारिणः // ते ब्रमंति पुरात्मान-स्तिर्यगर्नपरंपरां // 25 // विषयेन्यो जनाः सौख्यं / कीदृशं नाम जायते // यत्र प्रत्युत दुःखाना-मुपयुपरि संततिः // 16 // किंपाकफलकल्पेभ्यो। विषयेभ्यः पराङ्मुखाः // ये नरास्तान्नमस्यामि / त्रिसंध्यं शुधचेतसा // UU // 27 // हा कष्टं वंचितो लोको / दीर्घकालं विसंस्थुलैः // विषयैर्विषमासंगै-विषवन्मारणात्मकैः // 27 // स्वर्गेऽपि मोहिताः संतो / हिताहितपराङ्मुखाः // च्युत्वा गर्नगृहे चूयो। विएमूत्रकृतलेपने // 17 // वसंत्यतीवबीजत्से / दुर्गधेऽत्यंतस्सहे // चर्मजालकसंबन्नाः / पित्तश्लेष्मादिमध्य गाः // 60 / / जनन्याहारनिष्पंदं / लिहंतो नामिकाच्युतं / पिंडीकृतसमस्तांगा / दुःखसंजारपीमि. ताः // 61 // त्रिनिर्विशेषकं / गादिनिर्गताः संतो। नियमाचारवर्जिताः // जीवघातरता धर्मे / विषीदति पदे पदे // 6 // तथा चात्रानृतं वाक्यं / वर्जनीयं प्रयत्नतः // हिंसायाः कारणं तक / सा च संसारकारणं // 63 / / स्तेयं च दूरतस्त्याज्यं / परस्त्री मातृसन्निना // ऽव्येबापरिमाणं च | / कर्तव्यं सुविवेकिना // 64 / उक्तं च भोजनत्यागः / सदाचारप्रवर्तनं / / मर्यादावर्तनं चैव / धः / मोऽयं मिहिसाधनः // 65 // श्रुत्वेदं सूरिसदाक्यं / संविमो रत्नसुंदरः // पप्रल प्रणतिं कृत्वा / / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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