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________________ 631 धम्मिः पुरंध्रीणां / धौरेयी सा व्यधीयत // 25 // तमदमाः परिन / सोढुमूढाः पुरंध्रयः // तस्याश्विदा. | एयनिद्राबु-लोचना बाबुलोकिरें // 16 // वसुदत्ता सुतं सूता / समये स्वात्मसन्निनं // पुत्रा मातृसमाः प्रायः / पुत्र्यः पितृसमाः पुनः // 17 // तदांतःपुरिकाः सर्वा / रोषदष्टोष्टपल्लवाः // सं. ऋय स्वामिनं गृढ-रोषैर्वाक्यैर्व्यजिझपन् / / श // विरक्तो यद्यपि स्वामी। वचोऽस्माकं न मन्यते // जिह्वा कंम्यते वक्तुं / तथापि स्नेहतो हितं // 27 // श्यं परनरासक्ता / नवीना वनिता तव तिप्रेमी चोरनायके पोताना अंतःपुरनी स्त्री मां पटराणी करी. / / 25 / / त्यारे ते पराजव सहन न करी शकवाथी तेनी परणेली स्त्रीने आंखो फाडीने तेणीना छिडो जोवा लागी. // 26 // प. जी समय श्राव्ये ते वसुदत्ताए पोतासरखा एक पुत्रने जन्म याप्यो, केमके प्रायें करीने पुत्रो मा. तासरखा तथा पुत्री पितासरखी थाय . // 27 // त्यारे सघली अंतःपुरनी स्त्री रोषयी होठ करमतीथकी एकठी थश्ने गुप्तरोषवाळां वचनोथी पोताना खामीने कहेवा लागी के, // 20 // जो के विरक्त थयेला स्वामी श्रमारं वचन माने नहि तो पण स्नेहनेलीधे अमारी जीन हित कहेवाने तल्पी रही . // 2 // था तमारी नवीन स्त्री परपुरुषमा बासक्त थयेली , जो म P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036433
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages204
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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