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________________ धारम- सादोऽयं / जीवन्मुक्तोऽस्मि यत्त्वया // 36 // जननीव सुतस्येद-मागस्त्वं सोढुमर्हसि // गुरोखि | न ते शिदा / जीवतां विस्मरिष्यति // 30 // विद्वान विद्यावधिवश्यो / गंजीरो गुणवानपि // यत्त्वं | विचिकृषे दोषः / स खलु प्राच्थकर्मणां // 30 // प्राझाः परःशताः संति / वि शूराः सहस्रशः // एए| जयत्यदाणि यः पंच / स वीरोऽतिबलः स हि // 35 // नवलदासुखं शीलं / विषयाः दणसौख्य // 35 // सतीनना श्रापथी राजा पण दणवारमां विनष्ट थाय , परंतु तें तो मारापर मोटी कृ. पा करी के मने जीवतो मुक्यो. // 36 // माता जेम पुत्रनो तेम तारे मारो या अपराध माफ करवो, तथा गुरुनी जेम तारी या शीखामण हुँ जीवीश त्यांसुधी चुलीश नहि. // 37 // (त्यारे शीलवती बोली के ) विद्वान, विद्याननी सीमासरखो, कुलीन, गंभीर तथा गुणवान एवो पण तुं जे विकारी थयो ते खरेखर तारां पूर्वकर्मनो दोष बे. // 30 // था पृथ्वीपर सेंकमोगमे विद्वानो तथा हजारोगमे शूरा माणसोने, परंतु जे पांचे इंदिनने जीते , तेज सुनट तथा अतिबलवा. न जे. // 35 // शील लाखोगमे नवोमां सुख देनाएं बे, बने विषयो क्षणमात्र सुख प्रापनारा बे, माटे एक दणमाटे कयो विचक्षण मनुष्य अनेक नवोनो विनाश करे? // 40 // जे मनु
SR No.036433
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages204
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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