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________________ धम्मि- त्वा करे तस्य / समर्प्य शफरानसौ // जगाम देहचिंतातः / सोऽपि तत्रैव तस्थिवान् // // दृ / | ष्ट्वा जलमनूपस्थं / मीनास्तत्र जलाशये // तेनालोक्यंत ताम्यंतो। मातुरंकमिवानकाः // 10 // नव्यात्मतया जाता-नुकंपः कंपयन् शिरः // बालोऽप्यपालधीधाम / मनसा विममर्श सः // 11 // 733 प्रविष्टा जलदुर्गेऽपि / ही कुकर्मसु कर्मवैः // अन्याया श्व बध्यते / दीना मीना अमी नरैः // 12 // | जंतुघातं प्रकुर्वति / दणिकस्वात्मतृप्तये // शीतले शापनोदाय / दवदानमिवाधमाः // 13 // अपि श्रावीने सुनंदने कहेवा लाग्यो के हुं हमणा यावं बुं त्यांसुधी तुं यहीं रहेजे. // 7 // एम कही तेना हाथमां ते मत्स्यो सोंपीने ते देहचिंतामाटे गयो, अने ते सुनंद पण त्यांज बेठो. // // // हवे त्यां ते जलाशयमां नजीक रहेछु जल जोश्ने माताना खोळामां जेम बालको तेम ते मत्स्योने तेणे तडफमता जोया. // 10 // त्यारे ते सुनंद बालक होवा तां पण महाबुझिवा. न नव्य जीव होवाथी दयायुक्त थश्ने मस्तक धुणावतोथको मनमां विचारखा लाग्यो के, // 11 // परेरे! जलरूपी किल्लामां नरा बेठेला एवा पण या विचारा मत्स्योने नीच कार्यमां यासक्त थयेला मनुष्यो अन्याय करनाराजनीपेठे बांधे ! // 12 // अधम माणसो ठंडीनी असर दर | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036433
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages204
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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