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________________ 732 धाम्म- देशा-द्ययौ पल जिघृदया // एकेनागंतुना युक्त-स्तदा सौनिकपाटकं // 4 // विक्रीते प्राक्तने / मा मांसे / नवे त्वक्वथिते पशौ // नवितव्यतया तत्र / न तान्यां पलमाप्यत // 5 // मूर्ते जलच. रावते / ततः कैवर्तपाटके // तौ जग्मतुर्न तत्रापि / लेनाते प्राग्हतांस्तिमीन् / / 6 / / सुनंदेन नि. पिछोऽपि / तत्र प्राघुर्णकोऽग्रहीत् // जीवतः शफरान पंच / क नु मिथ्यादृशां कृपा // 7 // व्याव तॊऽसावुपजला-शयं वापि जलाशयः // जगौ सुनंदमन वं / तिष्टेविदुपैम्यहं // 7 // इत्युदि. महाधन घणी भक्तिपूर्वक तेजनो नोजनसत्कार करखा लाग्यो. // 3 // ते वखते पिताना हुकमथी ते सुनंद मांस लेवानी बाथी आवेला एक परोणाने साथे लेश्ने कसाश्वामामां गयो. // // // त्यां पूर्वनुं मांस वेचार जवाथी, तथा नवो पशु चामडीना दरदवाळो होवाथी नवितव्यताने योगे तेजने मांस मल्यु नहि. // 5 // पनी ते मूर्तिवंत जलचरोनी खाणसरखा मबीमा. रना पामामां गया, परंतु त्यां पण तेजने प्रथमथी मारेलां मत्स्य मयां नहि. // 6 // सारे ते परोणाए सुनंदे निषेध्या छतां पण त्यांथी पंच जीवता मत्स्यो लीधा, केमके मिथ्यात्वीनने दया क्यांथी होय? // 9 // पजी त्यांथी पाग वळीने ते जड श्राशयवाळो परोणो एक जलाशयपासे P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Tu
SR No.036433
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages204
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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