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________________ धम्मिः // 4 // श्रस्तं रूपं बलं बुप्तं / रुहः कंठो हृता रदाः // जरेयताप्यतुष्टा मे / चेतनामपि लिप्सते. // 5 // हरित्केशांकुरान् पाक-पांकुरांस्तन्वती जरा // तृष्णां संवर्धयत्येव / चैत्रानंपसहोदरा // | // 6 // तदस्ति यावदायुर्मे / पारं तारुण्यवारिधः // परलोकहितं किंचि-त्तावत्कुर्वे समाहितः / / | // 7 // मया श्रियोजनाद्भोगाचार्थकामौ कृतार्थितौ // अथैतव्यमूलस्य / धर्मस्यावसरो मम मोए था कर्यु, हजु था करवान बे, एम हजु ज्यां थमो विचारीये जीये तेवामांज वैरीननी धामनीपेठे या जराए अमोने घेरी लीधा बे. // 4 // मारुं रूप नष्ट कर्यु, बल लोपी नाख्युं, कंठ रोकी दीधो तथा दांतो पामी नाख्या, एटलाथी पण संतोष न पामीने या जरा मारी चैतन्यश. तिने पण ले लेवा श्खे . // 5 // चैत्रमासना ताप सरखी था जरा केशोरूपी लीला अंकुरा. नने पाकवाथी पांसुर बनावीने उलटी तृष्णाने वधारे जे. // 6 // माटे युवावस्थारूपी समुडना किनारासरखं ज्यांसुधी मारुं थायु जे, त्यांसुधी हुं सुखे समाधे कईक परलोकनुं हित कलं. // 7 // में लक्ष्मी नपार्जन करीने अर्थ तथा कामने तो कृतार्थ कर्या , हवे था ऽव्यना मुलरूप धर्मकार्य करवानो मारो अवसर जे. // 7 // वल्प कालनी मुसाफरीमाटे पण लोको ज्यारे सगवम P.P.Ac Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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