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________________ धम्मिा बागमभु पितरं / पृष्ट्वेत्यनुमतो मया // यातः स पुनरायातः / दाणादेवेत्यवोचत / श्या या सारी पृष्टो मातस्त्रार्थे / तातो मामन्वशादिति // दृष्ट्वा राजांगजारागं / वत्स गबसि किं मुदं // 25 // दादालतामिव मयः / कस्तूरी मिव सैरिभः // मुक्तावलीमिवारिष्ट-स्त्वमेनां प्राप्तुमर्हसि // 26 // 524 वाधिकैः सह संबंधं / न बनंति सुबुध्यः // पटवलं विपुलश्रोतः-श्रोतसा दीर्यते न किं // 17 // वत्स त्वदुचिताः कन्याः / संपत्स्यते परा अपि // दास्यस्य स्पृहयाबुश्चे-त्तदेतामुररीकुरु // 20 // परणवं उचित . // 23 // तारा मातपिताने पूजीने तुं जलदी आवजे, एम में अनुमति पाप्या थी ते जश्ने क्षणवारमा पागे धावी बोल्यो के, // 24 // हे माताजी! थामाटे पूज्वाथी मारा पिताए मने कां के, हे वत्स! राजपुत्रीनो राग जोश्ने तुं शामाटे खुश थाय ? // 25 // नं. ट जेम द्रादवल्लीने, पाडो जेम कस्तूरीने, दरिडी जेम मीतीजनी माळाने तेम तं या राजकन्याने मेलववाने लायक गे. // 26 // सुबुछि माणसो पोताथीं अधिक मनुष्योसाथे संबंध बांधता न थी, केमके विशाल फरणाना प्रवाहथी शुं नानुं तनाव फाटी जतुं नथी? // 27 // वली हे वत्स! | तारा लायक बीजी कन्या पण मलशे, माटे जो तने दासपणानी ना होय तो या राजपुत्री PP.AC.GunratnasuriM.S. . Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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