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________________ समकित-प्रवेश, भाग-1 प्रवेश : पंचपरमेष्ठी की शरण में जाना तो समझ में आता है लेकिन वीतरागी जैन धर्म की शरण में जाने का मतलब क्या है ? समकित : पंच परमेष्ठी द्वारा बताया गया मार्ग (रास्ता) ही वीतरागी जैन धर्म है। उस रास्ते पर चलना ही जैन धर्म की व पंच परमेष्ठी की शरण में जाना है। प्रवेश : वह मार्ग (रास्ता) क्या है ? समकित : वह रास्ता है- स्वयं की शरण में जाना। पंच परमेष्ठी भी यही कर रहे हैं। वह भी स्वयं की शरण में हैं। इसलिए पंचपरमेष्ठी भी जिसकी शरण में हैं, हमें भी उसी की शरण में जाना चाहिए। ऐसा करने से हमारे सारे दुःख दूर होकर सच्चे-सुख की प्राप्ति हो सकती है। सच्चे सुख की प्राप्ति ही मोक्ष की प्राप्ति है। प्रवेश : यह केवली कौन होते हैं ? क्या तीर्थंकर को ही केवली कहते हैं ? समकित : अगली कक्षा में यह भी पता चल जायेगा। देखो जी आदीश्वर स्वामी, कैसा ध्यान लगाया है / कर ऊपर कर सुभग विराजै, आसन थिर ठहराया है ।।टेक।। जगत विभूति भूति सम तजकर, निजानन्द पद ध्याया है / सुरभित श्वासा आशा वासा, नासा दृष्टि सुहाया है / / 1 / / कंचन वरन चले मन रंच न, सुर-गिरि ज्यों थिर थाया है / जास पास अहि मोर मृगी हरि, जाति विरोध नशाया है / / 2 / / शुध-उपयोग हुताशन में जिन, वसुविधि समिध जलाया है / श्यामलि अलकावलि सिर सोहे, मानो धुआँ उड़या है / / 3 / / जीवन-मरन अलाभ-लाभ जिन सबको नाश बताया है / सुर नर नाग नमहिं पद जाके "दौल" तास जस गाया है / / 4 / / 1.self 2.miseries 3.real bliss 4.achievement
SR No.035325
Book TitleSamkit Pravesh - Jain Siddhanto ki Sugam Vivechana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMangalvardhini Punit Jain
PublisherMangalvardhini Foundation
Publication Year2019
Total Pages308
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size117 MB
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