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________________ 72 ] [ तर्कसंग्रहः व्याख्या-अनुमान प्रमाण है और अनुमिति प्रमा अर्थात् अनुमान साधन ( करण ) है और अनुमिति फल ( साध्य == ज्ञान)। अतः अनुमिति के करण को अनुमान कहा जाता है। अब प्रश्न यह है कि अनुमिति का करण क्या है? इसके उत्तर में प्राचीन नैयायिक व्याप्ति न को करण मानते हैं तथा नवीन नैयायिक परामर्श को। ग्रन्थकार अन्नम्भट्ट यहाँ नवीन नैयायिकों के पक्ष का आश्रय लेकर 'परामर्श' को अनुमिति का करण मानते हुए कहते हैं 'परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः' अर्थात् परामर्श है 'अनुमान प्रमाण' और तज्जन्य ज्ञान है 'अनुमिति'। प्राचीनों के मत में 'परामर्श' व्यापार है। अब प्रश्न है कि 'परामर्श' का क्या अर्थ है? परामर्श शब्द का अर्थ है'व्याप्ति से विशिष्ट हेतु का पक्ष में रहने का ज्ञान' ( व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः) अर्थात् साध्य (व्यापक - अग्नि आदि) के साथ नियतरूप से रहने वाले साधन (व्याप्य-धमादि) का साध्यस्थल (पक्षपर्वतादि ) में रहने का ज्ञान परामर्श है। न्यायदर्शन में अनुमान के पाँच अवयव माने गये हैं 1. प्रतिज्ञा–पर्वतो वह्निमान् ( पर्वत में आग है)। 2. हेतु-धूमवत्वात् ( क्योंकि पर्वत में धूम है)। 3. उदाहरण-यो यो धूमवान् स स वह्निमान् यथा महानसम् ( जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ आग रहती है / जैसे रसोईघर ) / 4. उपनय-तथा चायम् (यह पर्वत भी रसोईघर के समान वह्निव्याप्य धूमवाला है)। 5. निगमन-तस्मात्तथा ( अतः यह पर्वत भी आग वाला है)। इस पाँच अवयव वाले उदाहरण में पर्वत पक्ष (जहाँ साध्य सिद्ध किया जाता है) है। पर्वत में आग की सत्ता साध्य है। धम हेतु (लिङ्ग) है। रसोईघर सपक्ष (प्रसिद्ध उदाहरणस्थल ) है। धूम और आग के साहचर्य को बतलाने वाला उदाहरण-वाक्य व्याप्ति है। उदाहत व्याप्ति की विशेषता से विशिष्ट हेतु (धूम ) का पक्ष (पर्वत ) में रहने का प्रतिपादन करने वाला वचन उपनय ( हेतु का उपसंहार) अनुमानलक्षणम् ] [73 है। 'पक्ष ( पर्वत ) में साध्य ( आग) की स्थिति अबाधित है' ऐसा 'प्रतिपादक वाक्य निगमन (साध्य का उपसंहार) है। धूम आदि हेतु 'व्याप्य' है / आग आदि साध्य 'व्यापक' है। तपाये गये लौहपिण्ड में आग तो है, परन्तु धूम नहीं है। ऐसा होने पर भी जहाँ धूम रहता है वहाँ आग अवश्य रहती है। इस तरह विध्यात्मक अनुमिति में हेतु * व्याप्य होता है और साध्य व्यापक / इन दोनों के साहचर्य-नियम को ही व्याप्ति कहते हैं। जहाँ साध्य का पहले से निश्चय रहता है उसे सपक्ष कहते हैं, जैसे रसोईघर / जहाँ साध्य के अभाव का निश्चय रहता है उसे विपक्ष कहते हैं, जैसे-तालाब / हेतु को ही लिङ्ग कहते हैं। पञ्चमी या तृतीया विभक्ति के द्वारा इसे प्रदर्शित किया जाता है। हेतु को पक्ष और सपक्ष में रहना चाहिए तथा विपक्ष में नहीं रहना चाहिए, तभी सही अनुमिति होती है। इसका विचार आगे करेंगे / अनुमानादि का स्वरूप निम्न है अनुमान प्रमाण--'अनुमितिकरणमनुमानम्' जिससे अनुमिति हो उसे अनुमान कहते हैं / परामर्श को आवश्यक मानने वाले प्राचीन नैयायिकों के अनुसार 'व्याप्तिज्ञान' अनुमान है और 'परामर्श' व्यापार / परन्तु नव्य नैयायिकों के अनुसार 'परामर्श' ही अनुमान है। अतः 'परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः' कहा है, यहाँ परामर्शजन्य का अर्थ है 'लिङ्गपरामर्शजन्य' / अतः ग्रन्थकार आगे स्वयं कहते हैं 'स्वार्थानुमितिपरार्थानुमित्योलिङ्गपरामर्श एव करणम् / तस्माल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्'। __ अनुमिति-'परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः' लिङ्गपरामर्श से उत्पन्न होने वाला ज्ञान अनुमिति है। इसका आकार है 'पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानम्' 'पर्वत आग वाला है' यह ज्ञान अनुमिति है। परामर्श-'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' व्याप्ति से विशिष्ट हेतु का पक्ष में रहने का ज्ञान परामर्श है। जैसे-वह्नि का व्याप्य (व्याप्ति से विशिष्ट ) धूम ( हेतु) का पर्वत ( पक्ष) में /
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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