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________________ 68] [ तर्कसंग्रहः मौन हैं। वायु के त्वाच प्रत्यक्ष के विषय में दो मत हैं जो उद्भूत रूप को भी त्वाच प्रत्यक्ष के प्रति कारण मानते हैं उनके यहाँ वायु अनुमेय है और जो नव्य ) त्वाच प्रत्यक्ष के प्रति केवल उद्भूत स्पर्श को कारण मानते हैं उनके यहाँ वायु का त्वाच प्रत्यक्ष होता है। (2) संयुक्त-समवाय सन्निकर्ष- द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले गुण और कर्म का भी प्रत्यक्ष नैयायिक मानते हैं / अतः जब इनका प्रत्यक्ष होता है तो इन्द्रिय का इनके साथ सीधा सम्पर्क न होकर परम्परया होता है। जैसे-घटरूप के प्रत्यक्ष में चक्ष का घट के साथ संयोग (संयुक्त) होगा पश्चात् घट में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले रूप का प्रत्यक्ष होगा। इस परम्परया सम्बन्ध का ही नाम है 'संयुक्त-समवाय सन्निकर्ष' / इस तरह घटादि द्रव्यों में रहने वाले रूपादि गुणों (शब्द गुण को छोड़कर ) तथा कर्मों का प्रत्यक्ष इसी सन्निकर्ष से होता है। प्राण इन्द्रिय और रसना इन्द्रिय से जो क्रमशः गन्ध और रस का प्रत्यक्ष होता है वह इसी सन्निकर्ष से होता है। घटत्व आदि जातियों का प्रत्यक्ष भी संयुक्त-समवाय सन्निकर्ष से ही होगा क्योंकि वे घटादि में समवाय सम्बन्ध से रहती हैं। इस तरह जो द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहेगा 'उसके प्रत्यक्ष के प्रति संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष कारण होगा। श्रोत्र को छोड़कर शेष इन्द्रियों से यह सन्निकर्ष होता है। (3) संयुक्त-समवेत-समवाय सन्निकर्ष-द्रव्य में समवेत (समवाय . / सम्बन्ध से वर्तमान )जो गुणादि पदार्थ हैं उनमें भी समवेत (समवाय सम्बन्ध से वर्तमान) रूपत्व आदि का प्रत्यक्ष होने पर संयुक्त-समवेतसमवाय सन्निकर्ष होता है। जैसे-घटगत रूपत्व जाति के चाक्षुष प्रत्यक्ष में चक्षु का घट के साथ संयोग (संयुक्त) होगा पश्चात् घट में समवाय संबन्ध से रहने वाले ( समवेत ) रूप के साथ संयुक्तसमवाय होगा और इसके बाद रूप में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले रूपत्व के साथ चक्षुसंयुक्तसमवेत-समवाय सन्निकर्ष होगा। इसी / सन्निकर्षभेदाः ] [69 तरह रसत्व, स्पर्शत्व, गन्धत्व आदि गुणगत जातियों का तथा कर्मगत कर्मत्व जाति का भी प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेतसमवाय सन्निकर्ष से होता है। यह भी परम्परया सम्बन्ध है। यह सन्निकर्ष कर्ण इन्द्रिय को छोड़कर शेष इन्द्रियों के साथ पाया जाता है। (4) समवाय सन्निकर्ष-शब्द गुण के प्रत्यक्ष में समवाय सन्निकर्ष कारण होता है क्योंकि शब्द आकाश का गुण माना जाता है। गुण (शब्द ) गुणी ( आकाश ) में समवाय सम्बन्ध से रहता है। नैयायिकों के अनुसार श्रोत्रेन्द्रिय ( कर्ण विवर ) आकाश ही है. अन्य कुछ नहीं। द्रव्यात्मक श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द गुण के साथ संयोग सन्निकर्ष हो नहीं सकता है, अतः यहाँ सीधा समवाय सन्निकर्ष माना गया है। यहाँ एक प्रश्न उठाया जाता है कि जब समवाय नित्य सम्बन्ध है तो वहाँ व्यापार का लक्षण कैसे जायेगा? दीपिका टीका में इसका / उत्तर दिया है कि शब्द-प्रत्यक्ष में शब्द ही व्यापार है अथवा श्रोत्रेन्द्रिय एवं मन का संयोग व्यापार है। यह सन्निकर्ष केवल शब्द के प्रत्यक्ष में श्रोत्रेन्द्रिय के साथ पाया जाता है। (5) समवेत-समवाय सन्निकर्ष - शब्दत्व जाति के प्रत्यक्ष में समवेत-समवायसन्निकर्प कारण होता है। शब्द का और श्रोत्रेन्द्रिय का सन्निकर्ष समवाय है तथा शब्द में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली शब्दत्व जाति के साथ समवेत-समवाय सन्निकर्ष होता है। (6) विशेषण-विशेष्यभाव सन्निकर्ष-अभाव पदार्थ के प्रत्यक्ष में विशेषण-विशेष्यभाव सन्निकर्ष होता है / अभाव प्रत्यक्ष के सन्दर्भ में एक प्रश्न है कि अभाव के साथ इन्द्रिय का न तो संयोग सम्बन्ध संभव है और न समवाय, फिर उसका प्रत्यक्ष कैसे होगा? मीमांसक एवं वेदान्ती तो अभाव के ज्ञान को प्रत्यक्ष नहीं मानते हैं अपितु अनुपलब्धि नामक अलग प्रमाण मानते हैं। परन्तु नैयायिकों ने अनुपलब्धि को प्रमाण नहीं माना है। अतः वे अभाव के प्रत्यक्ष के लिए विशेषण-विशेष्यभाव सम्बन्ध मानते हैं। जैसे-'भतले घटाभावः' भूतल में घट का अभाव है। यहाँ भूतल अधिकरण है और उसमें
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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