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________________ [ तर्कसंग्रहः (1) वैशेषिकों का पीलुपाक (परमाणुपाक)-वैशेषिकों के अनुसार अवयवी से ढके हुए अवयवों में रूपान्तर की प्राप्ति बिना अवयवी के नष्ट हुए नहीं हो सकती है। अतः जब श्याम घट (कच्चा घड़ा) को अग्नि-संयोग से पकाया जाता है तो अवयवीरूप घट का नाश हो जाता है और वह घट परमाणुओं में विभक्त हो जाता है पश्चात् अग्नि के संयोग से उन परमाणुओं के रूपादि में परिवर्तनरूप पाक होता है पश्चात् वे सभी परमाण द्वषणुकादिक्रम से पुनः घट का रूप धारण कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में विभिन्न मतों के अनुसार 5, 9, 10, 11 पल का समय लगता है। इस मत में पृथिवी के परमाणुओं की गन्ध भी अनित्य है। (2) नैयायिकों का पिठरपाक (अवयवी-पाक )-नैयायिकों के अनुसार द्वघणुकादि अवयवी में भी पाक होता है। उनका कथन है कि अवयवी घट आदि में सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिनमें अग्नि के सूक्ष्म अवयव प्रविष्ट हो जाते हैं और तब अवयवी से लेकर परमाणुपर्यन्त अवयवों में एक साथ रूपान्तरप्राप्ति हो जाती है। इस प्रक्रिया में अवयवी घटादि के नाश की जरूरत नहीं पड़ती है। इस मत में कल्पना-गौरव का अभाव है तथा व्यवहारिकता भी है। इस संदर्भ में कारिकावली में कहा है एतेषां पाकजत्वं तु क्षितौ नान्यत्र कुत्रचित् / तत्रापि परमाणौ स्यात्पाको वैशेषिके नये / / 105 // नैयायिकानां तु नये द्वषणुकादावपीप्यते / [5. संख्यायाः किं लक्षणं, कुत्र च सा वर्तते ? ] एकत्वादिव्यवहारहेतुः संख्या। सा नवद्रव्यवृत्तिः। एकत्वादिपरार्धपर्यन्ता। एकत्वं नित्यमनित्यं च / नित्यगतं नित्यम् / अनित्यगतमनित्यम् / द्वित्त्वादिकं तु सर्वत्राऽनित्यमेव / ___ अनुवाब-[५. संख्या का लक्षण क्या है और वह कहाँ रहती है? ] एकत्व आदि (एक, दो, तीन आदि ) व्यवहार के हेतुभूत संख्यालक्षणम् ] [ 37 गुण को संख्या कहते हैं। वह संख्या पृथिवी आदि सभी नवों द्रव्यों में रहती है तथा वह एकत्व। एक) से लेकर परार्ध तक है। एकत्व संख्या नित्य भी है और अनित्य भी है। नित्यगत (पृथिवी, जल, तेज और वायु के परमाण तथा आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन इन नित्यपदार्थों में रहने वाली) एकत्व संख्या नित्य है तथा अनित्यगत (कार्यरूप अनित्य पदार्थों में रहने वाली ) एकत्व संख्या अनित्य है। द्वित्व आदि दो, तीन आदि) संख्या सर्वत्र (चाहे नित्य द्रव्यगत हो अथवा अनित्य द्रव्यगत) अनित्य ही है। ___व्याख्या-'यह एक है', 'ये दो हैं' इत्यादि ज्ञान के प्रति असाधारण निमित्तकारण होने वाला गुण है-'संख्या'। यहाँ आकाशादि में अतिव्याप्ति वारणार्थ हेतु शब्द का अर्थ असाधारणनिमित्तकारण समझना चाहिए। संख्या की गणना 10 सामान्य गणों में की जाती है। संख्या एक से लेकर परार्ध ( एक लाख एक लाख एक करोड़) तक होती है। शंकर मिश्र ने 'बहुत्व' को भी संख्या माना है / एकत्व अणुओं में तथा आकाशादि नित्य द्रव्यों में नित्यरूप से रहता है तथा घटादि कार्यों में अनित्य एकत्व रहता है। द्वित्वादि संख्यायें चणकादि कार्यों में रहती हैं तथा वे अनित्य ही होती हैं। लकड़ी का एक टुकड़ा जब तक ट्टा नहीं है तब तक उसमें एकत्व है परन्तु टूटने पर उसमें द्वित्वादि संख्यायें हो जाती हैं। अतः उसका एकत्व तथा द्वित्वादि अनित्य है, बुद्धिसापेक्ष है। अन्नम्भट्ट एनं वैशेषिकों के मतानुसार द्वित्व केवल अपेक्षाबुद्धि के द्वारा ज्ञाप्य ही नहीं है अपितु जन्य भी है। अपेक्षाबुद्धि का अर्थ है-'अनेकैकत्वबुद्धिर्या साऽपेक्षाबुद्धिरुच्यते' जब दो द्रव्य सामने होते हैं तब दोनों में पृथक्-पृथक् रूप से एकत्व रहता है परन्तु जब उन दो इकाइयों का ज्ञान हमें एक इकाई के रूप में होता है तो उसे द्वित्त्व कहते हैं। द्वित्त्वज्ञान के बाद अपेक्षाबुद्धि समाप्त हो जाती है। परवर्ती नैयायिक संख्या को पदार्थान्तर मानते हैं. गुण नहीं क्योंकि गुण में गुण कैसे रहेगा? इस संदर्भ का विचार पहले किया जा चुका है।
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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