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________________ zlcPhilo बातों में यदि साधु दूषित बनजावे तो बकु पीत वस्त्र गृहण करने में रंगदार वस्त्र धार lle ! रहता है, एसा इस प्रमाण से सिद्ध की टीका में श्रीमान हरिभद्रसूरिश्वरजी महाराज फरमाते हैं कि प्रमाण 8 बकुशो द्विविधः, उपकरणशरीरभेदात्, तयोरुपकरणबकुश उपकरणे वस्त्रपात्रादौ अभिष्वक्तचित्तः- प्रतिबद्धस्नेहः समुपजाततोषः विविध देशभेदेन वस्त्रं पौण्ड्रवर्धनककाशीकुलकादि पात्रमपि पूरिकगन्धारकप्रतिग्रहकादि विचित्रं रक्तपतिशीतविन्दु" पट्टकादिप्रचितं महाधनं महामूल्यं एवमादिना उपकरणेन युक्तो ममेदं अहपस्य स्वामीत्युपजातमूर्छः पर्याप्तोपकरणोऽपि भूयो बहुविशेषोपकरणकांक्षायुक्तो, बहुः विशेषो यत्र मृदुदृढलक्षणधन निचित " रुचिरवर्णादिः" तादृशोपकरणे लब्धव्ये जातकांक्षो जाताभिलाषः सर्वदा च तस्योपकरणस्य प्रतिसंस्कारः प्रावल्येन दशाबन्धघटिकासंवेष्टनादिकं सेवमानस्तच्छीलः उपकरणवकुशः // भावार्थ-बकुश दो तरह के प्रथम उपकरण बकुश, द्वितीय शरीर बकुश, जिस में प्रथम श्रेणी वाले को वस्त्र पात्रादि में विशेष मूर्छा होती है, और वह पौण्ड वर्धनक-काशी अथवा कुलकादिकं Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035299
Book TitleVastravarnasiddhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandanmal Nagori
PublisherSadgun Prasarak Mitra Mandal
Publication Year1927
Total Pages18
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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