SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 43
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ विशेष विवरण : ३१ : पंन्यासजी महाराज अब यहां से विहार कर संवत् १९४५ में अब अपनी दीक्षाकाल के ठीक ३२ वर्ष बाद उदयपुर पधारें । श्री संघने शानदार स्वागत किया । आप मालदासजी की सेरी में चाबाई की धर्मशाला में बिराजे | जो कि आपके दादा गुरुजी के उपदेशों द्वारा ही बनाई गई थी । I यहाँ पर भी कुपंथियों का पहले बडा जोर था । यहां भी आपने विरोधियों का मुकाबला किया । कुपंथी लोगों का इतना बोलबाला था की साधुओं को कही उपाश्रय में आश्रय तक नहीं मिलता था, अतः आपके दादागुरुजी श्री हर्ष - विजयजी महाराजने चाबाई नामक श्राविका को अगुआ बनाकर श्री संघ में से चंदा मंडा कर यह धर्मशाला बनवाई | • पर यह धर्मशाला छोटी थी उसकी पूर्ति भी आपने ही की । आपके उपदेश से ही यह धर्मशाला अब विशाल रूप में मंदिरजी के साथ विद्यमान है । यह सब पूज्य पंन्यासजी महाराज की कृपा का सुमधुर फल है । संवत् १९४६ का चातुर्मास आपने इसी धर्मशाला में श्री संघ के अधिक आग्रह होने पर किया । इस चातुर्मास में बडी धूमधाम रही। आपकी विख्याति इतनी फैली की आपके सदुपदेश का पान करने के लिये उदयपुर के महाराणा साहब ने भी आपको अपने महल में आमंत्रित किया । आप Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035285
Book TitleTattvavetta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPukhraj Sharma
PublisherHit Satka Gyanmandir
Publication Year1954
Total Pages70
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy