SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 32
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ : २० : तत्ववेत्ता यहाँ पर काफि समय स्थिरता कर देशना सुधा का जनता को पान कराकर पुनः विहार कर अनेक गाँवों में घूमते हुए पतितपावन पञ्चमकाल का शिवसोपान सिद्धक्षेत्रपालीताणा पहुंचे । पुण्य तिथि चैत्री पूर्णिमा को पंन्यासजी श्री उम्मेद विजयजी के साथ साथ ही श्री सिद्धगिरि - दादा की सानन्द यात्रा की । इस यात्रा से आपको बडा ही आनंद मिला । भला यहाँ आने पर आनन्द किसे नहीं होता ? जिस पुण्य क्षेत्र में हजारों ही नहीं बल्कि असंख्य महापुरुष यहाँ आकर शिवगति को पाये है। ऐसे दुरितनिवारण - पुण्य क्षेत्र में आने पर किसे आनन्द प्राप्त नहीं होता है ? शायद कोई ऐसा अभागा होगा जो कि इस आनन्द से वंचित रहा होगा ? यहाँ तो काफि संख्या में साधुगण बिराजमान रहते है। संघ का तो पारावार ही नहीं । जैसे पूर्णिमा के रोज समुद्र का पानी उमड आता है ठीक वैसे ही इस तीर्थ पर मानव मेदिनी उमड आती है । जिसमें भी चैत्री पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा और अभी अक्षयतृतीया के मेले पर तो भीडभीड लग जाती है । इतनी धर्मशाला होने पर भी जगह की उस समय तंगी हो जाती है। आपने अपनी विद्वत्ता से यहाँ भी अपना प्रभाव जमाया। सभी साधुगणों से मिले । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035285
Book TitleTattvavetta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPukhraj Sharma
PublisherHit Satka Gyanmandir
Publication Year1954
Total Pages70
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy