SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 39
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( १८ ) पद्मकी शोभाको धारण करनेवाले जिनेश्वर, ताथा भविष्य में तीर्थों की प्रवृतिकरनेवाले ईश्वर, श्री पद्मनाभभगवानको मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूं । अनंतर इसके उन दोनो राजा रानीके महान् पुण्यके उदयसे, अनेक सुखका स्थान, भले प्रकार मातापिताको संतुष्ट करनेवाला, परम ऋद्धिधारक, श्रेणिक नामका पुत्र उत्पन्न हुवा | कुमार श्रेणिक सर्वोत्तम गुण थे, उसका रूप शुभ था और अतिशय निर्मल था । वह अत्यंत भाग्यवान् और लक्ष्मीवान् था । कुमार श्रेणिकके कामिनी स्त्रियोंके मनको लुभानेवाले काले काले केश ऐसे जान पड़ते थे मानो उसके मुख कमलकी सुगंधि सर्पही आकर इकट्ठे हुवे हैं । उसका विस्तीर्ण सुंदर और अतिशय मनोहर तिलकसे शोभित ललाट, ऐसा मालूम पड़ता था मानों ब्रह्माने तीनोंलोकके आधिपत्यका पट्टकही रचा है । वालकके दोनो नेत्र नलिकमलके समान विशाल अतिशय शोभित थे । दोनों नेत्रोंकी सीमा बाँधने के लिये उन के मध्य में अतिशय मधुर सुगंधिको ग्रहण करनेवाली नासिका शोभित थी । स्फुरायमान दाप्तिधारी बालक श्रेणिकका मुख यद्यपि चंद्रमाके समान देदीप्यमान था तथापि निर्दोष, सदा प्रकाशमान, और समस्त प्रकारके कलंकोंसे रहित ही था । विशाल एवं अतिशय मनोहर हारोंसे भूषित उसका वक्षःस्थल राज्य भारके धारण करनेके लिये विस्तीर्ण Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy