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________________ ( २७५ ) अभिमानी किन्तु अतिशय दुःखित वे दोनों भाई कुछ विद्या सीखनेकेलिए चम्पापुरीकी ओर चल दिये । उससमय चम्पापुरीमें कोई शिवमति नाम का ब्राह्मण निवास करता था। शिवभूति वैद्य विद्याका अच्छा ज्ञाता था इसलिये वे दोनों भाई उसके पास गये । एवं कुछ काल वैद्यक शास्त्रों का भलेप्रकार अभ्यास कर वे भी वैद्य विद्याके उत्तम जानकार वन गये । जब उन्होंने देखा कि हम अच्छे विद्वान बन गये तो उन दोनोंने अपनी जन्म भूमि बनारस आनेका विचार किया एवं प्रतिज्ञानुसार वे वहांसे चल भी दिये । मार्ग में वे आनन्द पूर्वक आरहे थे अचानक ही उनकी दृष्टि एक व्याघ्र पर पड़ी जो व्याघ्र सर्वथा अंधा था और आंखों के न होनेसे अनेक क्लेश भोग रहा था । ____ व्याघ्रको अंधा देख धनमित्रका चित्त दयासे आई होगया । उसने शीघ्र ही अपने छोटे भाईसे कहा प्रिय धनचंद्र ! कहो तो मैं इस दीन व्याघ्रको उत्तम औषधियोंके प्रतापसे अभी सूझता करदूं ? यह विचारा आखोंके बिना बड़ा कष्ट सह रहा है । धनभित्रकी ऐसी बात सुन धनचंद्रने कहा - ____नहीं भाई इसे तुम सूझता मत करो । यह स्वभावसे | दुष्ट है इसके फंदेमें पड़कर अपनी जान वचनी भी कठिन पड़ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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