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________________ ११५ पौषधोपवास व्रत ( २ ) सत्साहित्य के वांचन से हृदय में जो प्रश्न उत्पन्न हों, उनका समाधान करने के लिए गुरु महाराज से पूछना, पूच्छना है । ( ३ ) सीखे यानि प्राप्त किये हुए ज्ञान का बार-बार चिन्तन करना और प्राप्त ज्ञान दृढ़ करना, परियटना है । ( ४ ) प्राप्त ज्ञान के अर्थ एवं भेदोपभेद को जानने के लिए उस पर विचार करना, अनुप्रेक्षा है । धर्म-ध्यान के चार अनुप्रेक्षा भी हैं - एकानुप्रेक्षा, अनित्यानुप्रेक्षा, अशरणानुप्रेक्षा और संसारानुप्रेक्षा । हृदय में उत्पन्न विचारधारा यानि भावना को अनुपेक्षा कहते हैं । इन चारों अनुप्रेक्षाओं का स्वरूप भी थोड़े में बताया जाता है: . १ एकानुप्रेक्षा -- आत्मा को समस्त साँसारिक संयोगों से भिन्न तथा अकेला मान कर तत्सम्बन्धी भावना करना, एकानुप्रेक्षा है । २ अनित्यानुप्रेक्षा – समस्त सांसारिक एवं पौद्गलिक संयोगों को अनित्य ( सदा न रहने वाले ) मान कर तत्सम्बन्धी भावना करना, अनित्यानुप्रेक्षा है । ३ अशरणानुप्रेक्षा - समस्त सांसारिक सम्बन्धों के लिए यह मानना कि ये मेरे लिए शरणदाता नहीं हो सकते और ऐसा मान कर तत्सम्बन्धी भावना करना, अशरणानुप्रेक्षा है । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035262
Book TitleShravak Ke Char Shiksha Vrat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchand Shreeshrimal
PublisherSadhumargi Jain
Publication Year1941
Total Pages164
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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