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१५६] संक्षिप्त जैन इतिहास। बंधवाकर डलवा दिया था; परन्तु वह अपने ‘आत्मबलसे बन्धनमुक्त होगये थे। इस कारावासकी दशामें ही मुनि मानतुङ्गजीने प्रसिद्ध 'भक्तामरस्तोत्र रचा था; जिसका छयालीसवां काव्य रचते२ ही उनके बन्धन अपने आप नष्ट होगये थे। उनके माहात्म्यसे प्रभावित हो, कहते हैं कि राजा भोज और कवि कालिदास भी जैन धर्मानुयायी होगये थे।' जैन कवि धनंजय भी राजा भोजके समकालीन बताये जाते हैं। इन्होंने अपने पुत्रको सर्पदंशके विषसे मुक्त करनेके लिये 'विषापहार स्तोत्र' की रचना की थी। इनके अन्य ग्रन्थ नाममाला, द्विसंधानकाव्य, विषापहारस्तोत्र, वैद्यकनिघंटु आदि हैं।' ब्रह्मदेवके अनुसार 'द्रव्यसंग्रह' के कर्ता श्री नेमिचंद्राचार्य श्री भोजदेवके दरबारमें थे। नयनंदि नामक जैनाचार्यने अपना ‘सुदर्शन चरित्र' इन्हींके राजत्वकालमें समाप्त किया था।
भोजने चालीस वर्षतक राज्य किया था और उसके बाद संभवतः उसका पुत्र जयसिंह गद्दीपर बैठा था। इसके समयमें राजा भोजके साम्राज्यपर विपत्तिके बादल छागये थे, जिनको इसके उत्तराधिकारी उदयादित्यने दूर किया था। राजा भोजका समकालीन कच्छपघात (कच्छवाहा) वंशी राजा
अभिमन्यु था; और उसकी प्रशंसा स्वयं भोजदबकुंडके कच्छवाहे राज़ने की थी। यह राजा चड़ोभनगर (दूबकुंडव जैनश्रेष्टी दाहड़। शिवपुर) से राज्य करता था। इसके नाती
विक्रमसिंहका एक शिलालेख संवत् ११४५ १-भक्तामर कथा-जैप्र० पृ० २३९ । २-मजैइ० पृ० ५६ । ३-मप्राजैस्मा०, भूमिका पृ० २०। ४-महिई०, पृ० ३१७।। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com