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________________ संक्षिप्त जैन इतिहास । तत्कालीन धर्म व सब ही राजकीय अथवा अन्य दान जैन और साहित्य ! बौद्ध संस्थाओंको दिये जाते थे। ब्राह्मण वर्गकी ___मान्यता तबतक न कुछ थी।' किंतु गुप्तकालमें ब्राह्मणोंका भाग्य चमका था। गुप्तराजाओंकी राजधानी ब्राह्मण धर्मका केन्द्र बन गई और नवीन वैदिक धर्मका पुनरुत्थान होगया । इतनेपर भी जनसाधारणमें जैन और बौद्ध धर्मोकी प्रधानता अक्षुण्ण रही थी। जैन मटोंमें उच्चकोटिकी शिक्षाका प्रबन्ध प्रायः देशभरमें था। इन तीनों धर्मों के विद्वानोंमें परस्पर सर्द्धा भी खूब थी, जैसे कि पहले लिखा जाचुका है। ब्राह्मण वर्गकी मुख्य भाषा संस्कृत थीं। किंतु जैनों और बौद्धोंके ग्रन्थ अब भी प्राकृत और पाली भाषाओंमें थे। राज्यका संरक्षण पाकर इस समय संस्कृ तका प्रचार और महत्व बढ़ रहा था । बौद्धोंने भी संस्कृतमें ग्रन्थ रचना प्रारम्भ कर दी थी और उनकी देखादेखी जैनोंने भी संस्कृ तको प्रधानता दी थी; परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि इस समयके पहले जैनोंमें संस्कृत रचनाओंका अभाव था। इस समयके ग्रन्थों में मुख्य विषय तर्क और न्याय था । विद्वानोंमें परस्पर वाद होते थे। सिद्धसेनदिवाकरके समान चतुर्दश विद्या १-हिमारूई०, पृ० १४७।। २-हिआरूई०, पृ० १५६। गुप्तकाल में संस्कृत भाषाका अधिक प्रचार हुआ। कवि कालीदास नामक कोई कवि इसी समय हुए थे। अमरकोष, आर्यभट्टका गणित शास्त्र, वराहमिहिरका ज्योतिष ग्रंथ और धन्वंतरिका वैद्यक विज्ञान इसी समयकी रचनायें हैं । ३-जैहि०, भा० १९ पृ० १५६ । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035244
Book TitleSankshipta Jain Itihas Part 02 Khand 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1934
Total Pages204
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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