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________________ ३८ ] सांक्षप्त जैन इतिहास प्रथम भाग | HUI HUS हैं। वहां सब प्रकारकी जड़ी बूटी. फल फूल और अन्य अनेक वस्तुएं उत्पन्न होती हैं I हमारे पर्वतों में बहुतसी घाटियां ऐसी मिलती हैं जो निस्संदेह स्वर्गके नमूने हैं। जैसे कि काश्मीरकी दृश्यावली. कुल्लूकी घाटियां और दार्जिलिंगकी चोटियां । साराशमें यह देश इस योग्य है कि यहांके निवासी न इसपर अभिमान करें वरन् शुद्धभावसे इसकी पूजा करें ।* भारतवर्षकी जन संख्या । इस समस्त भारतकी जनसंख्या सन् १९२१ ई० की सरकारी मनुष्यगणना के विवरण के अनुसार ३१८९४२४८० है । प्रत्येक धर्मके अनुयायियों की संख्या अलग अलग इस प्रकार है: धर्म जनसंख्या २१६७३४५८६ ६६७२५३३० ११७०५९६ हिन्दू मुसलमान ' सिक्ख ईसाई जैन ४७५४०६ ११५७२३८ बौद्ध एवं अन्य ३२६७९३२४ किन्तु सन् १९४१ की गणना में यह संख्या करीब ४१ करोड़ है । भारतवर्षकी प्राचीन और अर्वाचीन आकृति । भूतत्वविद्या के मतानुसार भारतवर्षकी प्राचीन आकृति वर्तमानकी भांति नहीं थी। उनका कहना है कि किसी समय पहिले उस प्रदेश * Ibid : भाग १. पृष्ठ ३५-३६. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035242
Book TitleSankshipta Jain Itihas Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1943
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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