SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 61
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ५२ ) पवित्र कार्य को जिन्होंने अपने जीवन में अपना लिया हो, उनकी ऐसी प्रवृतियां कभी हो सकती है क्या ? क्या सेवा का क्षेत्र इतना गंदा और मलीन है कि जिससे मानव दानव बनजाय ? सेवा जिस के हृदय में बसी होती है वह पूरा सह - शील बनता है, वह दया और दाक्षिण्यवाला बनता है । उसके हृदय में पवित्रता और उसकी वासी में मधुरता और उसके आचार में आदर्श ओत-प्रोत हो जाता है । वह लोभी नहीं रहता, वह स्वार्थान्ध नहीं बनता, वह जिद्दी नहीं बनता, वह अभिमानी नहीं बनता । उसका एक ही लक्ष्य रहता है और वह यही कि मैं किसी भी प्रकार दूसरों का भला करू - मैं किसी प्रकार दूसरों के दुःखों को हलका करने का प्रयत्न करूं । आज सच्चे सेवकों के बीच में ऐसे लोग घुस गये हैं, जिनका समाज में कोई स्थान नहीं, जिनमें कोई योग्ता नहीं, अनुभव नहीं । सेवा का क्षेत्र महान और पवित्र है । इस पवित्र क्षेत्रको अपनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि वह पहिले अपना जीवन शुद्ध बनाकर ही इस पवित्र क्षेत्र में पदार्पण करे । आज के समय में दंभ चल नहीं सकता, सत्ता के श्रागे जनता की शान्तता भले ही न चले, किन्तु कोई दंभी सेवक जनता के हृदय में तो स्थान नहीं पा सकेगा, यह बात तो निर्विवाद है । और जहां दंभ है वहां आत्म कल्याण भी नहीं है। जनता के हृदय में स्थान पानेवाले के लिये समय आने पर जनता से घड़े भरती है । और जनता को सताकर अपनी सत्ता जमाने वाले दंभी सेवकों के पीछे जनता थूकसे घड़ा भरती है । इसलिये जनता की सेवा करने वाले, निर्दोभिता, निष्कपटता और निर्मलतापूर्वक सच्ची सेवा करें, इसी में उनका और जनता का कल्याण है । सु Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035233
Book TitleSamayik Lekh Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Jain Granthmala
Publication Year1953
Total Pages130
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy