SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 103
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ६४ ) - इसी प्रकार की दूसरी एक उल्टी प्रवृत्ति का भी उदाहरण दु । जिस प्रकार हमारा नैतिक स्तर ऊंचा लाने के लिये कहा जाता है उसी प्रकार स्वास्थ्य के प्रयत्न हो रहे हैं किन्तु स्वास्थ्य के नाश करने के साधन जब तक बन्द न किये जाएगे तब तक स्वास्थ्य का प्रचार कभी सिद्ध होने का नहीं है। मैं एक उदाहरण दूं । अभी गर्मियों के दिनों में एक डाक्टर ने मुझे कहा शिवपुरी में लड़के लड़कियों में और कुछ बड़ों में भी गले का और खांसी का रोग बहुत बढ़ा है। तलाश करने पर मालूम हुआ कि जब से शिवपुरी में आईस्क्रीम की दो फेक्टरियां खुली है तब से यह रोग फैला है। रंग डालकर के पानी के बरफ के टुकड़ों को तीलियों पर लगा कर पैसे दो दो पैसे में बेचे जाते हैं। लड़के लड़कियां रंगीन बरफ को देखकर ललचाते हैं और चूस चूम कर बीमार पड़ते हैं। एक तरफ से लड़कों के मां बापों को लड़को बीमार करने में खर्च हुआ और दूसरी तरफ से दवाई का खर्चा बढ़ा । हमारे नन्हें नन्हें बालकों के स्वास्थ्य को नाश कर के, उनके जीवनों को नष्ट करके, उनकी पवित्रताओं का नाश करके पैसा बटोरने के लिये ऐसी फेक्टरियां और सिनेमाओं को खोलने वाले हमारे श्रीमन्त लोग देशके शुभेच्छुक हैं क्या? सोचने की बात है यूरोप और अमेरिका का अनुकरण हम कर रहे हैं परन्तु भूलना न चाहिये कि यह भारतवर्ण, यह श्रास्तिक देश, यह ईश्वर को मानने वाला देश, यह पुण्य पाप के फलों पर श्रद्धा रखने वाला देश मानव जाति का हित करने वाला हमारा देश, अपना नुकसान उठा करके भी दूसरों का भला करने वाला हमारा देश, हिंसा में पाप मानता है । किसी की बहन बेटी के सामने में न करने में भी पाप मानता है ऐसे देश यूरोप और अमेरिका का अनुकरण कर के शक्तिहीन, धर्महीन, ब्रह्मचर्यहीन नहीं बन सकता । इसका Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035233
Book TitleSamayik Lekh Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Jain Granthmala
Publication Year1953
Total Pages130
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy