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________________ ( ४ ) व्वतित्थयरनिद्दिछं माहणकुंडग्गामाओ नयराओ उसभमाहणस्स भारियाए देवाणंदाए माहणीए जालंधरस कुच्छीओ खत्तियकुंडग्गामे नयरे नायाणं खत्तियाग यस्स खत्तियस्स कासवगुत्तस्स भारियाए तिसलाए पाणीए वासिस गुत्ताए कुच्छिसि गन्भत्ताए साहरा इति । टीका- ततः श्रेयः खलु ममापि किं तदित्याह श्रमण भगवंत रं चरमतीर्थकरं पूर्वतीर्थकरैर्निर्दिष्टं ब्राह्मणकुंडग्रामात् त् ऋषभदत्तस्य ब्राह्मणस्य भार्यायाः देवानंदायाः गयाः जालंधर सगोत्रायाः कुक्षेर्मध्यात् क्षत्रियकुंडग्रामे ज्ञातानां श्रीऋषभदेवस्वामिवंश्यानां क्षत्रियविशेषाणां सिद्धार्थस्य क्षत्रियस्य काश्यपगोत्रस्य भार्यायाः त्रिश: क्षत्रियाण्याः वाशिष्ठसगोत्रायाः कुक्षौ गर्भतया यितुं इति । अर्थ-विस्तीर्ण अवधिज्ञान धारण करनेवाले श्रीइन्द्रराज ने देवानंदा ब्राह्मणी की कुक्षि में श्रीवीर प्रभु को वर्यरूप उत्पन्न हुए देख कर अपने मन में विचार किया कि सेयं खलु ममवि - ततः श्रेयः खलु ममापि ] तू उससे कल्याण निश्चय मेरा भी है। क्या कल्याणक है बताते हैं कि पूर्व तीर्थकरों ने बताया है कि श्रमण भगवान् वीर चरम [ केले ] तीर्थकर को ब्राह्मण कुंडग्राम नगर से भदन्त ब्राह्मण की भार्या [स्त्री ] जालंधरस गोत्रवाली Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035214
Book TitlePrashnottar Vichar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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