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प्रश्नोत्तररत्नमाळा
करानेवाली सत्संगति को ही प्राप्त करने का हमेशा लक्ष्य रखना चाहिये ।
११२-जहां गया अपलक्षण आवे, ते तो सदाही कुसंग कहावे-जिस की संगति से कोई न कोई अपलक्षणअवगुण प्राप्त हो उसे शास्त्रकार कुसंग कहते हैं और वैसे कुसंग का सदैव त्याग करने का उपदेश करते हैं । कुसंग से कौन २ से अवगुण जीव को प्राप्त नहीं होते ? सब अवगुण मात्र कुसंग से ही पैदा होते हैं और इसी लिये शस्त्र कार सर्वथा उसका त्याग करने को फरमाते हैं। जो निकटभवी जन कुसंगति का सर्वथा त्याग कर सत्संगति का प्रादर करते हैं वे अन्त में सर्व उपाधि से मुक्त हो कर निरुपाधिक, निद्वंद्व मुकिसुख प्राप्त करते हैं । अतः विचारशील प्राणियों को नीच, नादान, जनों की संगति तथा बुरे कामों से दूर रहने को सर्वदा सचेत रहना चाहिये ।
११३-रंग पतंग दुर्जन का नेहा, मध्यधार जो आपत छेहा जो उत्तम पुरुषों के भी छिद्र दृढ़ता है, सब का अनिष्ट चाहता है, प्रसंग के उपस्थित होने पर दूसरों का अपायअहित करने के लिये चाहे जैसी मुसिबत सहने को तैयार रहता है, यदि उसमें सफल हो जाता है तो फूला नहीं समाता है और कदाच असफल होता है तो दिनरात उसी की चिन्ता कर तंदुलिया मच्छ के सदृश दुर्गति के कर्मबंधन करता है, ऐसे कनिष्ट कोटि के जीव क्षुद्र-दुर्जन कहलाते हैं। उनका स्नेह केवल कृत्रिम-पतंग के रंग सदश होता है । स्व इच्छित कार्य की सिद्धि के लिये है वे उपर से राग बतलाते हैं, खुशामद करते हैं, सेवा करते हैं, और हर प्रकार से खुश करने का प्रयत्न करते हैं परन्तु अपना Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com