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________________ प्रश्नोत्तररत्नमाळा :: २८ :: है । जो स्वयं गुणी हो कर दूसरे के सद्गुणों को सहन नहीं कर सकता और इसलिये उसके ऊपर अकृत्रिम प्रेम रखने के स्थान में द्वेष इर्षा या मत्सर धारण करता है वह स्वयं स्वगुण से च्युत हो कर भव अटवी में ही भटकता रहता है । अर्थात् द्वेष दोष से अच्छे गुणों का भी नाश हो जाता है और उत्तम गुणराग से गुणहीन भी उन्नति को प्राप्त करता है । श्रीमद् यशोविजयजी उपाध्यायने १८ पापस्थानक की संज्झाय में द्वेष की संज्झाय में द्वेष दोष से होनेवाली महाहानि और गुणराग से होनेवाला एकान्त आत्मलाभ का भलो. भांति वर्णन किया है, अत: उससे उस सम्बन्ध में विशेष मनन कर कृष्ण वासुदेव के समान सदगुणग्राही बनने का प्रयत्न करना उचित है। ३४. जोगी जस ममता नहीं रति--जिस को रंचमात्र भी परपुदगल वस्तु में ममता नहीं होती वह ही सच्चा योगी है। उत्तम प्रकार के योग से जिसने ममता का नाश कर दिया है वह ही मोक्ष का आधकारी हो सकता है । ममता मूर्छा हो सचमुच परिग्रहरूप है अार परिग्रह से उन्मत्त हुए बेचारे जीवों की केवल दुर्दशा ही होती है । तिस पर भी जो साधु वेष धारण कर परिग्रहण धारण करते हैं उनकी तो सर्वत्र महा विटम्बना होती है । क्योकि वे साधु वेष में जगत को ठगते हैं अर्थात् धर्मठग बन जगत को ठगते हैं और संवज्ञ भगवान की पवित्र आज्ञा का भंग करते हैं । सर्वज्ञ भगवान ने साधु को द्रव्य भाव से निर्ग्रन्थपन धारण करने का आदेश दिया है। द्रव्य से बंग आदि और भाव से मूळ का परित्याग करना भगवानने फरमाया है। उस प्रकार प्रतिज्ञा करने पर भी पुनः प्रतिज्ञा भ्रष्ट हो कर ममता धारण करना अत्यन्त अनुचित है । कहां भी हैं कि " ममता थिर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035213
Book TitlePrashnottarmala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKarpurvijay
PublisherVardhaman Satya Niti Harshsuri Jain Granthmala
Publication Year1940
Total Pages194
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size17 MB
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