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________________ आगम (०५) भाग-1 "भगवती- अंगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) भाग-१ शतक [१], वर्ग, अंतर-शतक , उद्देशक [१], मूलं ७-११] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता आगमसूत्र[०५] अंगसूत्र[०५] भगवती मूलं एवं दानशेखरसूरिरचिता वृत्ति: प्रत श्रीभग शतके सूत्रांक Titisarmilimw बता [७-११] सूत्रम् गाथा are हारयोग्यस्कंधपरिणामेनावस्थानं इत्यर्थः, भावओ वण्णमंताई गंधमंताई रसमंताई फासमंताई आहारेंति, जाई भावओ वष्णमंताई आहारेंति ताई कि एगवण्णाई आहारेंति जाव किं पंचवष्णाई आहारेंति ? गोयमा ! ठाणमग्गणं पड़च्च एगवण्णाईपि आहारेंति जाब |TET | पंचवण्णाईपि आहारैति, विहाणमग्गणं पडुच्च कालवण्णाइपि आहारेंति जाव सुकिल्लाईपि आहारेंति, तत्र 'ठाणमग्गणं पहुचत्ति तिष्ठ-| न्त्यस्मिन्निति स्थान-सामान्यं यथैकवर्णमित्यादि, 'विहाणमग्गणं पडुच्च'त्ति विधानं-विशेषः कालनीलादिरिति ६, जाई वण्णओ कालवण्णाई आहारेंति ताई कि एगगुणकालाई आहारति जाव दसगुणकालाई आहारति ? संखेजगुणकालाई० असंखेजगुणकालाई | अणंतगुणकालाई आहारेंति ?, गोयमा! एगगुणकालाईपि आहारेंति जाव अर्णतगुणकालाईपि आहारैति७, एवं नीलवण्णाई ८, पीय वण्णाई ९, रत्तवण्णाई १०, सुकिल्लाई ११, एवं गंधओऽवि सुब्भिगंधाई १२ दुब्भिगंधाई १३, रसओवित्ति जाई भावओ रसमंताई | किं तित्त १ कडय २ अंबिल ३ महुर ४ कसाय ५ परिणयाई आहारेंति १८, एवं जाई भावओ फासमंताई ताई ठाणमग्गणं पडुच्च णो| एगफासाई आहारैति णो दुफासाई आहारेंति नो तिफासाई आहारेंति, एकस्पर्शानामसंभवात्, अन्येषां चाल्पप्रादेशिकतामक्ष्मप-11 |रिणामाभ्यां ग्रहणायोग्यत्वात्, चउफासाईपि आहारति जाव अट्टफासाइंपि आहारेंति, बहुप्रदेशताबादरपरिणामाभ्यां ग्रहणयोग्यत्वादिति, यथा एकस्मिन् सहकारे गुरुत्वं १ मृदुत्वं २ शीतत्वं ३ स्निग्धत्वं ४ एवं चत्वारः स्पर्शाः, एतद्विपरीतास्त्वन्ये चत्वारः स्पर्शाः ज्ञेयाः, विहाणमग्गणं पडुच कक्खडाईपि आहारति जाव लुक्खाइपि आहारति १९, जाई फासओ कक्खडाई आहारैति ताई कि एगगुणककखडाई आहारति जाव अर्णतगुणकक्खडाईपि आहारेंति ?,गोयमा ! एगगुणकक्खडाईपि जाव अणंतगुणकक्खडाईपि आहा-In रेति २०-२७, एवं अवि फासा भाणियव्वा जाव अणंतगुणलुक्खाई आहारेंति, ताई किं पुढाई आहारति अपुढाई आहारॅन्ति?, गोयमा ! दीप अनुक्रम [८-१५] ~22~
SR No.035061
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 2 01 Bhagavati Mool evam Vrutti Aagam 5 Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages320
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size89 MB
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