SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 190
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [सू.] + गाथा: ॥१२॥ दीप अनुक्रम [११-३६] भाग-5 “आवश्यक”- मूलसूत्र - १ (निर्युक्तिः+चूर्णि:) 3 निर्युक्तिः [१२४३-१४१५/१२३१-१४१८], भाष्यं [२०५-२२७] अध्ययनं [४], मूलं [ सूत्र / ११-३६ ] / [गाथा - १, २], पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधिता मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिताः आगमसूत्र [४०] मूलसूत्र [०१] आवश्यकनिर्युक्तिः एवं जिनभद्रगणिरचिताचूर्णि: 3 प्रतिक्रमणा ध्ययने ॥ १७७॥ अतीता चक्कवडियो, जाहित्ति, गच्छति, हरिंथ विलग्गो, मणि हत्थिमत्थए कातूण पत्थितो, कतमालरण आइतो मतो, छड्डीए पुढवीए गतो ताहे ते रायाणो उदायिं वेति उदायिस्सवि चिंता जाता, एत्थ नगरे मम पिता आसिन अद्वितीय अण्ण नगरं कारेति, मग्गह वत्युंति वन्धुपाढगा पेसिता, तेवि एगत्थ पाडली उवरिं चासो अववासितणं तुंडणं पासंति, कीडगा से अप्पणी च्चैव मुहं अतिन्ति । किह सा पाडलिति १, - दो महराओ-दक्षिणा उत्तरा य, उत्तरमडुराओ वाणियदारओ दक्षिणमहुरं वहणजताए गतो, तत्थ तस्स एक्केण वाणियकेण सह मित्तता, तस्स भगिणी अणिका, तेण भत्तं कतं, सा से जेमेन्तस्स बीयणकं घरेति, सो तं पाएस आरद्धो णिवण्णेति, अज्शोववण्णो, मम्गाविया, ताणि तं भणंति-जदि इदं चैव अच्छसि जाब एक्कं दारगरूवं जाति तो देमो, पडिवण्णो, दिण्णा, एवं काली वच्चति, अण्णया तस्स दारगस्स अमापितीहि लेहो पेसितो 'अम्हे अंधलीभूताणि, जदि जीवंताण पेच्छतो तो एहि,' से लेहो उबणीतो, सो तं वायति, अमूणि मुयमाणो तीए दिडो, पुच्छति, न किंचि साहति तीए लेहो गहितो, वायितो, तं मणति-मा अद्धिति करेहि, आपुच्छामि, तीए सब्बं अमापितॄणं कहितं विसज्जिताणि, णिग्गताणि दक्षिणतो मराओ सा य अणिका गुब्विणी. सा अंतरापहे वियाता, चिंतेति अमापितरो नाम काहिंतिसि न कर्त ताहे रमावेंतो जणो भणति अणिआपुसोति, कालेण पचाणि तेहिवि से तं चैव नामं कर्त, अण्णं न पतिट्ठाहितित्ति, ताहे सो अष्णिकापुतो अमुक्कचालभावो भोगे अवहाय पव्वतो, थेरतणे विहरमाणो गंगाए तडे पुष्कभदं नाम नगरं गतो ससीसपरिवारो, तत्थ पुप्फकेतू राया, पुप्फवती देवी से जुगलाणि दारको दारिका य जाता, पुप्फचूलो पुप्फचूला य, ताणि अण्णमण्णमणुरत्ताणि, तेण रामाए चिंतितं जदि बिजोइज्जति तो मरि (190) पाटलि पुत्रीया पाटली ॥ १७७॥
SR No.035055
Book TitleSachoornik Aagam Suttaani 06 Aavashyak 3 Niryukti Evam Churni Aagam 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherParam Anand Shwe Mu Pu Jain Sangh Paldi Ahmedabad
Publication Year2017
Total Pages343
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy