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दशाश्रुत०
छेदसूत्र अन्तर्गत
प्रत
सूत्रांक/
गाथांक
[१७]
दीप
अनुक्रम
[२७७]
“कल्पसूत्रं (बारसासूत्रं) (मूलम्)
मूलं- सूत्र.[१७] / गाथा.||-||
मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित......."कल्प ( बारसा) सूत्रम्" मूलम्
१, दहिं २, नवणीयं ३, सप्पि ४, तिल्लं ५, गुडं ६, महुं ७, मजं ८, मंसं ९ ॥ १७ ॥ वासावासं पज्जोसवियाणं अत्थेगइआणं एवं वृत्तपुवं भवइ, अट्ठो भंते! गिलाणस्स, से य पुच्छिय - केवइएणं अट्ठो ? से वजा - एवइएणं अट्ठो गिलाणस्स, जं से पमाणं वयइ से य पमाणओ घित्तवे, से य विन्नविज्जा, से य विन्नवेमाणे लभिज्जा, से य पमाणपत्ते होउ अलाहि - इय वत्तवं सिआ ? से किमाहु भंते! ?, एवइएणं अट्ठो गिलाणस्स, सिया णं एवं वयंतं परो वइज्जा - पडिगाहेह अजो ! पच्छा तुमं भोक्खसि वा पाहिसि वा, एवं से कप्पइ पडिग़ाहित्तए, नो से कप्पइ गिलाणनीसाए पडिगाहित्तए ॥ १८ ॥ वासावासं पजो० अत्थि णं थेराणं तहप्पगाराई कुलाई कडाई पत्तिआई थिजाई वेसासियाई संमयाई बहुमयाई अणुमयाइं भवंति, जत्थ से नो कप्पइ अदक्खु वइत्तए " अत्थि ते आउसो ! इमं वा २” से किमाहु भंते ! १, सड्डी गिट्टी गिण्हइ वा, तेणियंपि कुञ्जा ॥ १९ ॥
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