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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक"- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययनं [9], मूलं [सू.] / [गाथा १-७], नियुक्ति : [१५२३] भाष्यं [२३१...', प्रक्षेप [१] गांध्य द्रीया प्रत सूत्रांक ||गा.|| आवश्यक- खमामि सबस्स अयपि ॥३॥" इत्यादि 'दुरालोइयदुप्पडिकते य उस्सग्गेत्ति एवं खामित्ता आयरियमादी ततो दुरालो-18|कायोत्सहारिभ- हैं इयं वा होज्जा दुप्पडिकंतं वा होजा अणाभोगादिकारणेण ततो पुणोवि कयसामाइया चरित्तविसोहणत्थमेव काउस्सगं प्रतिकाकरेंतित्ति गाथार्थः ॥ १५२२ ।। 'एस चरित्तुस्सग्गो' गाहा व्याख्या-एस चरितुसग्गोत्ति चरित्तातियारविसुद्धिनिमि-11 |न्तिविधिः दत्तोत्ति भणिय होइ, अयं च पंचासुस्सासपरिमाणो॥१५२३॥ ततो नमोक्कारेण पारेत्ता विशुद्धचरित्ता विशुद्धदेसयाणं दंसण-14 ॥७८६॥ विसुद्धिनिमित्तं नामुक्त्तिणं करेंति, चरित्तं विसोहियमियाणिं दसणं विसोहिज्जतित्तिकछु, तं पुण णामुक्त्तिणमेवं करंति, लोगसमुज्जोयगरे त्यादि, अयं चतुर्विंशतिस्तवे न्यक्षेण व्याख्यात इति नेह पुनव्याख्यायते, चतुर्विंशतिस्तवं चाभिधाय मूलसूत्र - लोगस्म दर्शनविशुद्धिनिमित्तमेव कायोत्सर्ग चिकीर्षवः पुनरिद सूत्रं पठन्ति MOसव्वलोए अरिहंतचेइयाण करेमि काउस्सरगं वंदणवत्तियाए पूअणवत्तियाए सकारवत्तियाए सम्माणवत्ति याए बोहिलाभवत्तियाए निरुवसग्गवत्तियाए साए मेहाए धिइए धारणाए अणुप्पहाए बहुमाणीए ठामि | काउस्सगं (सूत्रं)॥ क्षमे सर्वस्याहमपि ॥ ३ ॥ एवं क्षमयित्वाऽऽचाबांदीन ततो दुरालोचितं वा भवेत् दुष्प्रतिकान्त वा भवेत् अनाभोगादिकारणेन ततः पुनरपि कृत ७८६॥ सामाबिकाश्चारित्रपिशोधनामेव कायोत्सग कुर्वन्ति । एष चारित्रोत्सर्ग इति चारित्रातिचारविशुद्धिनिमित्त इति भन्वितं भवति, अयं च पञ्चाशदुशासपरिमाणः, ततो नमस्कारेण पारयित्वा विशुद्धचारित्रा विशुद्धदेशकानां दर्शनशुद्धिनिमित्तं नामोत्कीर्तनं कुर्वन्ति, चारित्रं विशोधितमिदानी दर्शनं विशुष्यस्वितिकृत्वा, तायुननामोत्कीर्तनमेवं कुर्वन्ति । दीप अनुक्रम [४०-४६]] Jantaintml Satarary.om पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[४०] मूलसूत्र-[०१] आवश्यक मूलं एवं हरिभद्रसूरि-रचिता वृत्ति: सर्वलोके स्थित अर्हत्चैत्य-आश्रित कायोत्सर्ग: ~261
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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