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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक”- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययन [४], मूलं [सू.] / [गाथा-], नियुक्ति : [१३७६] भाष्यं [२२३...], प्रत सूत्रांक आवश्यक- कालबेलं तुलति, अहवा तिसु उत्तरादियासु संझाए गिण्हंति 'चरिमति अवराए अवगयसंझाएवि गेहति तहावि न प्रतिक्रहारिभ 18|दोसोत्ति गाथार्थः ॥ १३७६ ॥ सो कालग्गाही बेलं तुलेत्ता कालभूमीओ संदिसावणनिमित्तं गुरुपायमूलं गच्छति । मणाध्य द्रीया सातत्धेमा विही अस्वाध्या७४८॥ आउत्तपब्वभणियं अणपुच्छा खलियपडियवाघाओ।भासत मूढसंकिय इंदियविसएतु अमणुण्णे ॥ १३७७ ॥ALA व्याख्या-जहा निग्गच्छमाणो आउत्तो निम्तो तहा पविसंतोवि आउत्तो पविसति, पुषनिग्गओ व जइ अणा- II तौ कालपुच्छाए कालं गेहति, पविसंतोवि जइ खलइ पडइ जम्हा एत्थवि कालुद उग्धाओ, अहवा घाउत्ति लेहुईगालादिणा। प्रविधिः 'भासत मूढसंकिय इंदियविसए अमणुण्णे इत्यादि पच्छद्धं सांग्यासिकमुपरि वस्यमाणं । अहवा इत्थवि इमो अत्यो| भाणियबो-चंदणं देतो असं भासंतो देह वंदणदुर्ग उवओगेण उ न ददाति किरियासु वा मूढो आवत्तादीसु वा संका कया न कयत्ति बंदर्ण देतस्स इंदियविसओ वा अमणुण्णमागओ ।। १३७७ ॥ दीप अनुक्रम [२९] ॥४८॥ कालवेला तोकयता, अधोतराषिषु लिम सम्पयायो गृहन्ति चरमामिति अपरस्यामपगतसम्व्यायामपि गृहन्ति, तथापि न दोष हति । स काल-II माही वेलां तोशयित्वा कालभूमिसंदिशननिमिचं गुरुपादमूले गच्छति, तत्रार्य विधिः यथा निर्गच्छमायुक्तो निर्गतलथा प्रविशवपि युक्तः प्रविशति, पूर्वनिर्गत एव पचनाप का पहाति प्रविपि परिस्खलति पतति बनावनापि काळ इवोधाता, अपना धात इति नारादिना, भाषमाणेखावि, मवानाप्वयम भणितम्या-वन्दन भन्यत् भाषमाणो वाति बम्बनविषापयोगेन नदाति निवास वा मत भावांविषामताभ कृता बेति। वन्यनं वषतोऽमनोशो देवियविषण भागतः ~186
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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