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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक"- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययन [४], मूलं [सू.] / [गाथा-], नियुक्ति: [१३२०...] भाष्यं [२१२...], % ac प्रत सूत्रांक CAC-AA-%% 4% * दान एस एवं भवइ २६, कह छेत्त'त्ति रायणियस्स कहं कहेमाणस्स तं कहं अछिदित्ता भवइ आसायणा सेहस्स, अच्छि|दित्ता भवइत्ति भणइ अहं कहेमि २७, 'परिसं भेत्तेति रायणियस्स कहं कहेमाणस्स परिसं भेत्ता भवति आसायणा सेहस्स, इह च परिसं भेत्तत्ति एवं भणइ-भिक्खावेला समुद्दिसणवेला सुत्तत्थपोरिसिवेला, भिंदइ वा परिसं २८, 'अणुछियाए कहेइ' राइणियस्स कहं कहेमाणस्स तीए परिसाए अणुट्टियाए अबोच्छिन्नाए अबोगडाए दोचंपि तच्चंपि कह कहेता भवइ आसायणा सेहस्स, इह तीसे परिसाए अणुट्टियाएत्ति-निविद्वाए चेव अवोच्छिनाएत्ति-जावेगोवि अच्छा अचोगडाएत्ति अविसंसारियत्ति भणिय होइ, दोचंपि तच्चंपि-विहिं तिहिं चाहिं तमेवत्ति जो आयरिएण कहिओ अत्थो तमेवाहिगारं विगप्पइ, अयमवि पगारो अयमवि पगारोतस्सेवेगस्त सुत्तस्स २९, 'संथारपायघट्टण'ति सेज्जासंधारगं पाएण संघट्टेत्ता हस्येण ण अणुण्णवित्ता भवइ आसायणा सेहस्स, इह च सेजा-सवंगिया संथारो अट्ठाइजहत्थो जत्थ वा नैष एवं भवति २५, कथा तेति राखिके को कषयति तो का छेदयति आशातना क्षय, भाळेता भपतीति भणति-हं कथयामि २७, पर्षद भेचेति राषिके कथा कथयति पर्षदो भेत्ता भवति भाशातना शैक्षप, रबर पर्षदो भेति एवं भणवि-भिक्षावेला भोजनवेला सूत्रार्थपौरुषीबेला, [भिनत्ति वा पर्षदं २८, मनुरिधतायां कथयति रात्रिक कथा कथयति तस्यां पदि अनुस्थितायामभ्युछिन्नापामध्यातायो (भसंविप्रकीर्णायौ) द्विरपि निरपि कथायाः कथयिता भवत्याशासमा पक्षसह तखा पर्षदि अनरियतावामिति निविटापामेव अन्यच्छिमायामिति बावदेकोऽपि तिति, अध्यातायामिति अविसंबताचामिति भणितं भवति, द्विरपि विरपि-विक्रयविकृया चतुर्भिः तमेवेति य आचार्वज कधितोलमेवाधिकार विकस्पयति, भयमपि प्रकारा, भयमपि प्रकारः तसंचेकख सूत्रस्य २९, संस्तारपावघनमिति वारपासंसारको पादेन संबधित्वा दोन नानुज्ञापविता भवति आशातना भीक्षण, इह च वारया-सर्षातिकी संसारक:-अतृतीयहरूः बत्र वा दीप अनुक्रम -5 [२७] ShEoHANew ~143
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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