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________________ आगम (४०) [भाग-३१] "आवश्यक"- मूलसूत्र-१/४ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) अध्ययन [४], मूलं [सू.] / [गाथा-], नियुक्ति: [१३०४] भाष्यं [२०६...], प्रत सूत्रांक आवश्यक- हारिभद्रीया ॥७१शा साडू जाया, एसा भावपणिहिसि । पणिहित्ति गयं १८।जहा इयाणि सुविहित्ति, सुविहीए जोगा संगहिया, विधिरनुज्ञा | विधी जस्स इहा, शोभनो विधिः सुविधिः, तत्रोदाहरणं जहा सामाइयनिजुत्तीए अणुकपाए अक्खाणर्ग मणाध्यक बारवई वेयरणी धन्वंतरि भविय अभविए विजे । कहणा य पुच्छियमिय गइनिसे य संयोही ॥१३०५॥ योगसं० सो वानरजूहबई कतारे सुविहियाणुकंपाए । भासुरवरबोंदिधरो देवो माणिओ जाओ (८४७) ॥१३०६॥ १९सुविधी जाव साहू साहरिओ साहूण समीवं । सुविहित्ति गयं १९ । इयाणि संवरेत्ति, संवरेण जोगा संगहिति, तस्थ वैतरणी क धा२०संवपडिवक्खेणं उदाहरणगाहा रेनन्दश्री वाणारसी य कोढे पासे गोवालभइसेणे य । नंदसिरी पउमसिरी रायगिहे सेणिए वीरो ॥ १३०७॥ व्याख्या कथानकादवसेया, तच्चेदं-रायगिहे सेणिएण बदमाणसामी पुच्छिओ, एगा देवी णट्टविहिं उवदसेत्ता गया है का एसा, सामी भणइ-वाणारसीए भइसेणो जुन्नसेट्ठी, तस्स भज्जा नंदा, तीए धूया नंदसिरी वरगविवजिया, सापू जाती, एषा भावप्रणिधिरिति । प्रणिधिरिति गतं, हवानी सुविधिरिति, सुविभिना योगाः संगृमन्ते, विधिर्यथा यस्पेष्टः, मथा सामायिकनियुको अनुकम्पावामाख्यान-धारवती वैतरणिः धन्वन्तरिभवोऽमण्यन वैयौ । कमर्म र पृष्टे च गतिनिर्देशन संबोधिः ॥ 1 ॥ स वानरयूथपतिः ॥७१२॥ कान्तारे सुविहितानुकम्पया। भासुरवरबोन्दीधरो देवो वैमानिको जातः ॥ २ ॥ यावत् साधुः संहृतः साधूनां समीपं सुविधिरिति गतं । इदानी संवर इति, संवरेण योगाः संगृह्यन्ते, तत्र प्रतिपक्षेणोदाहरणगाथा । राजगृहे श्रेणिकेन वर्धमानस्वामी पृष्टः, एका देवी नरविधिमुपदय गता कैसा !, स्वामी भणति-वाराणस्या भवसेनो जीर्णश्रेष्ठी, सस्य भार्या नन्दा, तस्या दुहिता नन्दधीरिति, वरविवर्जिता दीप अनुक्रम [२६] ~116
SR No.035031
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 31 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size90 MB
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