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________________ आगम (४०) प्रत सूत्रांक [-] दीप अनुक्रम [-] आवश्यक ॥१४०॥ %% [भाग-२८] “आवश्यक - मूलसूत्र - १/१ ( मूलं + निर्युक्तिः+वृत्तिः) अध्ययनं [–], मूलं [−/गाथा -], निर्युक्ति: [२६९], भाष्यं [३०...], निगदसिद्धैव, नवरं मूलसूत्रकर्त्तारो गणधरा उच्यन्ते ।। २६९ ।। गतं गणधरद्वारम् इदानीं धर्मोपायस्य देशका |इत्येतद्व्याचिख्यासुराहधम्मोवाओ पवयणमहवा पुव्वाइँ देसगा तस्स । सम्बजिणाण गणहरा चउदसपुब्बी व जे जस्स ॥ २७० ॥ सामाइयाइया वा वयजीवणिकाय भावणा पढमं । एसो धम्मोचाओ जिणेहि सव्वेहि उवइट्टो १९ ॥ २७९ ॥ गाथाद्वयमपीदं सूत्रसिद्धमेव ॥ २७० ॥ २७१ ॥ गतं धर्मोपायस्य देशका इति द्वारम्, इदानीं पर्यायद्वारप्रतिपादनायाहउसभस्स पुच्वलक्वं पुचंगूणमजिअस्स तं चैव । चउरंगूणं लक्खं पुणो पुणो जाव सुविहित्ति ॥ २७२ ॥ पणवीसं तु सहस्सा पुत्र्वाणं सीअलस्स परिआओ । लक्खाई इक्कवीसं सिसजिणस्स वासाणं ॥ २७३ ॥ पणं १२ पण्णारस १३ तत्तो अट्टमाइ लक्खाई १४ । अड्डाइज्बाई १५ तऔं वाससहस्साई पणवीसं १६ ।। २७४ ॥ तेवीसं च सहस्सा सयाणि अट्टमाणि अ हवंति १७ । इगवीसं च सहस्सा १८ वाससउणा य पणपण्णा १९ ॥ २७५ ॥ अद्धमा सहस्सा २० अहाइजा य २१ सत्त य सयाई २२ । • सपरी २३ विचत्तवासा २४ दिक्खाकालो जिनिंदाणं ॥ २७६ ॥ For Fans Only हारिभद्रीयवृत्तिः विभागः १ ~290~ ॥१४०॥ मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित आगमसूत्र [४०], मूलसूत्र [०१] "आवश्यक" मूलं एवं हरिभद्रसूरि-रचित वृत्ति ibrary.org
SR No.035028
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 28 Aavashyak Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages466
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aavashyak
File Size97 MB
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