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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्तिः ) वक्षस्कार [५], ----------------------------- ---------- मूलं [१२१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक वक्षस्कारे जन्ममहे अच्यूताशावादा [१२१] १२२ दीप अनुक्रम श्रीजम्बू-18|आ भिंगारहत्यमया एवं एएणं अभिलावेणं आवसथालपाईवायकरगरयणकरंडगपुष्फचंगेरीजाव लोमहत्थचंगेरीपुष्फ- द्वीपशा-18पडलगजावलोमहत्थपडलगसीहासणछत्तचामरतिल्लसमुग्गय जाव अंजणसमुग्गय हत्थगया अप्पेगइया देवा धूवकडुच्छु- न्तिचन्द्रीया वृत्तिः अहत्थगया हतु जाव हियया' इति ग्राह्य, अत्र व्याख्या-अप्येककाः चेलोरक्षेप-ध्वजोच्छ्रायं कुर्वन्ति, अप्ये- 18|| ककाः वन्दनकलाहस्तगता-मङ्गल्यघटपाणयः अप्येककाः भृङ्गारहस्तगताः, एवमनन्तरोक्तस्वरूपेण एतेनानम्तरव- ॥४१९॥ ॥रित्वात् प्रत्यक्षेणाभिलापेन सूत्रपाठेन अप्येककाः आदर्शहस्तगताः स्थालहस्तगताः यावपकटुच्छुकहस्तगताः || आधावंति परिधावतीत्यन्वयः शेष निगदसिद्धं प्रागुक्ताभिषेकाधिकारगतेन्द्रसूत्रसमानगमत्वात् । अथाभिषेकनिगमनपूर्वकमाशीर्वादसूत्रमाह तए णं से अच्चुइंदे सपरिवारे सामि तेणं महया महया अभिसेएणं अभिसिंचइ २ ता करयलपरिग्गहिरं जाव मत्थए अंजलिं कटू जपणं विजएणं बद्धावेइ २ ता ताहिं इटाहिं जाव जयजयसई पउंजति पउँजित्ता जाव पम्हल सुकुमालाए सुरभीए गन्धकासाईए गायाई लहेइ २ सा एवं जाय कापरुक्खगंपिय अलंकिय विभूसिरं करेइ २त्ता जाव णयिहिं बदसेइ २ चा अच्छेहिं सण्हेहिं स्ययामएहिं अच्छरसातण्डुलेहिं भगवओ सामिस्स पुरओ अमंगलगे आलिहइ, जहा-"दप्पण१ भदासर्ण २ वद्धमाण ३ बरकलस ४ मच्छ ५ सिरिवरछा ६। सोस्थिक्षणम्दावत्ता ८ लिहिआ अट्ठमंगलगा ॥१॥" लिहिण करेड़ उबयारं, किंते !, पाडलमलिअचंपगसोगपुन्नागचूअमंजरिणवमालिअवउल तिलयकणवीरकुंदकुगकोरंटपञ्चदमणगवरसुरभिगन्ध actaceaeesekseesekese [२४०] eseserce ॥४१९।। 68 ~84~
SR No.035025
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 25 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages344
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size80 MB
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