SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 152
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति" - उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [७], ---------------------- -------------------- मलं [१३५] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक द्वीपशान्तिचन्द्रीया वृतिः 90sae [१३५] ॥४५३॥ गाथा 18 वक्षस्कार गंभंते ! किंसंठिा अंधकारसंठिई पण्णता, गोअमा! उद्धीमुहकलंबुआपुष्फसंठाणसंठिआ अंधकारसंठिई पण्णत्ता, अंतो संकुभा बाहिं वित्थडा सं चेव जाव तीसे गं सम्वन्भंतरिआ बाहा मंदरपव्वयंतेणं छज्जोअणसहस्साई तिष्णि अ चपीसे जोअण तापक्षेत्र सू.१३५ सए छच दसभाए जोमणस्स परिक्खेयेणति, से णं भंते! परिक्खेवषिसेसे कओ आहिएतिवएजा, गो०! जे णं मंदरस्स पब्वयस्स परिक्खेवे तं परिक्खेवं दोहिं गुणेत्ता दसहि छेत्ता दसहि भागे हीरमाणे एस णं परिक्खेवविससे आहिएति वएजा, तीसे पं सम्पबाहिरिआ बाहा लवणसमुईतेणं तेसट्ठी जोअणसहस्साई दोणि य पणयाले जोअणसए छच्च दसभाए जोमणस परिक्खेवेणं, से ण भंते ! परिक्खेवविसेसे को आहिएतिवएज्जा, गो० ! जेणं जंबुद्दीवस्स परिक्खेये तं परिक्खेवं दोहिंगुणेत्ता जाव तं चेव तया ण भंते ! अधयारे केवइए आयामेणं पं०१, गो.! अट्ठहत्तर जोअणसहस्साई तिणि अ तेतीसे जोअणसए तिभागं च आयामेण पं० । जया णं भंते ! सूरिए सव्वबाहिरमंडल उपसंकमिशा चार चरइ तया णं किंसंठिआ ताबक्खित्तसंठिई पं०१, गो०? उद्धीमुहकलंचुआपुष्फसंठाणसंठिआ पण्णत्ता, तं चेव सव्यं अव्वं णवरं णाणत्तं जं अंधयारसंठिइए पुल्चवणिों पमाणं तं तावखित्तसंठिईए अव्वं, जं ताव खित्तसंठिईए पुलवणि पमाणं तं अंधयारसंठिईए अब्धति (सूत्र १३५) 'जया ण'मित्यादि, यदा भगवन् ! सूर्यः सर्वाभ्यन्तरमण्डलमुपसङ्कम्य चार चरति तदा किंसंस्थिता-किंसंस्थाना ॥५३॥ तापक्षेत्रस्य-सूर्यातपव्याप्ताकाशखण्डस्य संस्थिति:-व्यवस्था प्रज्ञप्ता, सूर्यातपस्य किं संस्थानमितियावत्, भगवानाहगौतम! अवमुख अधोमुखत्वे तस्य वक्ष्यमाणाकारासम्भवात् यत् कलम्बुकापुष्प-नालिकापुष्पं तसंस्थानसंस्थिता दीप अनुक्रम [२६०-२६२] ~152
SR No.035025
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 25 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages344
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size80 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy