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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्तिः ) वक्षस्कार [३], ------------------------------------------- ------ मूलं [४४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक श्रीजम्यू- द्वीपशान्तिचन्द्रीया वृत्तिः ॥१९८॥ సింహదారిని [४४] दात् 'भडचडगरपहगरसंकुल'त्ति ग्राह्य, 'सेणाए(बई) पहिअकित्ती इत्यादि प्राग्वत् , अन निष्ठितपौषधस्य सतो मागध-1|३ वक्षस्कारे | तीर्थमभियियासोर्भरतस्य यत् स्नानं तदुत्तरकालभाविबलिकर्माद्यर्थ, यदाह श्रीहेमचन्द्रसूरिपादाः आदिनाथचरित्रे- मागधती"राजा सर्वार्थनिष्णातस्ततो बलिविधि व्यधात् । यथाविधि विधिज्ञा हि, विस्मरन्ति विधि न हि ॥१॥" इति, अब थकुमारच सूत्रेऽनुक्तमपि बलिकर्म "व्याख्यातो विशेषप्रतिपत्ति"रिति न्यायेन ग्राह्यमिति ॥ अथ कृतस्नानादिविधिर्भरतो साधन र. ४५ यच्चक्रे तदाहतए णं से भरहे राया चालरचंटं आसरहं दुरुढे समाणे हयगवरहपवरजोहकलिआए सद्धि संपरिबुडे महयाभडपडगरपहगरवंदपरिक्खित्ते चकरयणदेसिअमग्गे अणेगरायवरसहस्साणुआयमग्गे महया उकिट्ठसीहणायबोलकलकलरवेणं पक्खुभिभमहासमुदरवभूअंपिव करेमाणे २ पुरस्थिमदिसाभिमुहे मागहतित्थेणं लवणसमुई ओगाहइ जाव से रहवरस्त कुष्परा उल्ला, तए णं से भरहे राया तुरगे निगिण्डई २ ता रह ठवेइ २ ता धणुं परामुसइ, तए णं तं अइरुग्गयबालचन्दइंदधणुसंकासं परमहिसदरिअप्पिअढघणसिंगरहअसारं उरगवरपवरगवलपवरपरहुअभमरफुलणीलिणिद्धधंतधोमपट्ट णिउणोविअमिसिमिसितमणिरयणघंटिआजालपरिक्खितं तडितरुणकिरणतबणिजबचिंध दररमलयगिरिसिहरकेसरचामरवालद्धचंदर्षिध कालहरिभरतपीअसुकिल्लयहुण्हारुणिसंपिणद्धजीवं जीविअंतकरणं चलजीर्ष धणू गहिऊण से णरवई उसु च वरखइरकोडि वइरसारतोंड कंचणमणिकणगरयणधोहसु ॥१९८॥ कयपुखं अणेगमणिरयणविविहसुविरइथनामधिं वइसाई ठाईऊण ठाणं आयतकण्णायतं च काऊण उसुमुदार इमाई वयणाई तत्थ भाणिभ अनुक्रम [६१] Seecene ~51~
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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