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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [४], ------------------------ -------- मूलं [७५] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक [७५] दीप अनुक्रम [१३०] किंचिविसेसूर्ण परिक्खेवणं उपि सत्तइकाणउए जोअणसए किंचिबिसेसूणे परिक्खेवणं, मूले विच्छिण्णे ममें संसित्ते उपि तणुए गोपुषछसंठाणसंठिए सवरयणामए अच्छे, से गं एगाए पउमवरवेइआए एगेण व वणसंडेणं सबओ समता संपरिक्सिसे सिद्धाययणस्स कूडस्स णं उप्पिं बहुसमरमणिजे भूमिभागे पण्णत्ते जाव तस्स णं बहुसमरमणिज्जास्स भूमिभागस्स बहुमज्झदेसभाए एत्य णं महं एगे सिद्धाययणे पण्णत्ते पण्णासं जोषणाई आयामेणं पणवीसं जोभणाई विकृखंभेणं छत्तीसं जोअणाई उद्धं उच्चत्तेणं जाव जिणपडिमावण्णओ भाणिअव्वो। कहि णं भन्ते ! चुहिमवन्ते वासहरपव्यए चुहिमवन्तकूडे नाम कूडे पण्णत्ते , गो० ! भरहकूडस्स पुरथिमेणं सिद्धाययणकूहस्स पञ्चत्थिमेणं, एस्थ णं चुहिमवन्ते वासहरपब्वए युलहिमवन्तकूडे णामं कूडे पण्णत्ते, एवं जो चेव सिद्धाययणकूडस्स उच्चत्तविक्खंभपरिक्वेषो जाव बहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमझदेसमाए एत्थ णं महं एो पासायव.सए पण्णत्ते वासहि जोभणाई अद्धजोअणं च उच्चत्तेणं इकतीसं जोषणाई कोसं च विक्खंभेणं अन्भुग्गयमूसिअपहसिए विव विविहमणिरवणभत्तिचित्ते बाबुअविजयवेजयंतीपढागच्छत्ताइच्छत्तक लिए तुंगे गगणतलममिलंघमाणसिहरे जालंतररयणपंजरुम्मीलिएस मणिरयणथूमिआए विअसिअसयवत्तपुंडरीअतिलयरयणद्धचंदचिसे णाणामणिमयदामाउंकिए अंतो वहिं च सण्हवइरतकणिजरुइलवालुगापत्थडे सुहफासे सस्सिरीअरूवे पासाईए जाव पटिरूवे, तस्स गं पासायवडेंसगस्स अंतो बहुसमरमणिले भूमिभागे पं० जाव सीहासणं सपरिवार, से केणद्वेणं भन्ते! एवं वुश्चइ चुलहिमन्तकूडे २१, गो०! चुहिमवन्ते णामं देवे महिदीए जाव परिवसइ, कहि णं भन्ते ! चुलहिमवन्तगिरिकुमारस्त देवस्स चुलहिमवन्ता णाभं रायहाणी पं०१, गो०1 चुहिमवन्तकूडस्स दक्खिणेणं तिरियमसंखेने वीवसमुरे बीईवइचा अण्णं जम्बुद्दी २ दक्खिणेणं बारस जोअणसहस्साई भोगाहित्ता इरथ णं चुलहि emestepseeeeeeeeeeeeeeee Jimtihemix ~246
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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