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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्तिः ) वक्षस्कार [४], ------------------------ ------- मूलं [७४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत द्वीपशा श्रीजम्बून्तिचन्द्रीया वृत्तिः सूत्रांक [७४] ॥२८९॥ दीप तुरगणरमगरविहगवालगकिण्णरररुसरभचमरकुंजरवणलयपउमलयभत्तिचित्ता खंभुग्गयवइरवेइभापरिगयाभिरामा विजाहर- शिवक्षस्कारे जमलजुअलजंतजुत्ताविव अधीसहस्समालणीआ रूवगसहस्सकलिआ मिसमाणा भिभिसमाणा चक्खुल्लोअणलेसा सुहफासा सस्सिरीअरूबा घंटावलिचलिअमहुरमणहरसरा पासादीआ, तेसिणं तोरणाणं उपरि बहवे अट्ठमंगलगा पं०, तं०-सोथिए सिविच्छे जाव पडिरूवा, तेसि ण तोरणाणं उवरि बहवे किण्हचामरज्मया जाव सुकिल्लचामराया अच्छा सल्हा रुष्पपट्टा बइरामयदण्डा जलयामलगंधिआ सुरम्मा पासाईया ४, तेसि पण तोरणाणं उप्पि बहवे छत्ताइच्छत्ता पडागाइपडागा घंटाजुअला चामरजुअला उप्पलहत्यगा पटमहत्थगा जाव सयसहस्सपत्तहत्यगा सब्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूषा, तस्स णं गंगापवायकुंडस्स बहुमज्झदेसभाए एत्थ णं महं एगे गंगादीवे णामं दीवे पण्णत्ते अट्ट जोषणाई आयामविक्वंभेणं साइरेगाई पणवीसं जोअणाई परिक्सवेणं दो कोसे ऊसिए जलंताओ सबवइरामए अच्छे सण्हे, से णं एगार पक्षमवरवेइआए एगेण य वणसंडेणं सब्बओ समन्ता संपरिक्खिते वण्णओ भाणिअब्बो, गंगादीवस्स णं दीवस्स उपि बहुसमरमणिजे भूमिभागे पण्णते, तस्स णं पाहुमज्मदेसभाए एत्थ णं महं गंगाए देवीए एगे भवणे पण्णत्ते कोसं आयामेणं अद्धकोसं विक्खंभेणं देसूणगं च कोसं उद्धृ उच्चत्तेणं अणेगखंभसयसण्णिविढे जाव बहुमज्झदेसभाए मणिपेढियाए सयणिजे, से केणटेणं जाव सासए णामधेजे पण्णते, तस्स गं गंगप्पवायकुंडस्स दक्खिणिल्लेणं तोरणेणं गंगामहाणई पनूढा समाणी उत्तरद्वभरहवासं एजेमाणी २ सत्तहिं सलिलासहस्सेहिं आउरेमाणी ॥२८९॥ २ अहे खण्डप्पवायगुहाए वेअपव्ययं दालइत्ता दाहिणभरहवासं एजेमाणी २ दाहिणभरहवासस्स बहुमज्दादेसभागं गंता पुरस्थाभिमुही आवत्ता समाणी चोइसहिं सलिलासहस्सेहिं समग्गा अहे जगई दालात्ता पुरत्विमेणं लवणसमुदं समप्पेइ, गंगा गं अनुक्रम [१२९] seeseeeese ~233
SR No.035024
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 24 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages426
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size104 MB
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