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आगम
(१४)
[भाग-१७] “जीवाजीवाभिगम" -
प्रतिपत्ति : [५], --------------------- उद्देशक: ], --------------------- मूलं [२३८] पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...आगमसूत्र-[१४], उपांगसूत्र-३] "जीवाजीवाभिगम" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति:
प्रत सूत्रांक
[२३८]
दीप अनुक्रम [३६३]
भणमित्यादि, सूक्ष्मनिगोवा भवन्त ! कतिविधाः प्रज्ञता:?, भगवानाह-गौतम! विविधाः प्रक्षपास्तपथा-पर्याप्ता अपर्याप्पाश, एवं जायादरनिगोद विषयमपि सूत्र वक्तव्यं । तदेवमुक्ता निगोदाः, अधुना निगोदजीवानधिकृत्य भेदाभसूत्रमाह-'निगोयजीवा णं भंते !!
इत्यादि सुगर्म, भगवानाह-गौतम! निगोदजीवा द्विविधाः प्रज्ञप्तास्तद्यथा-सूक्ष्म निगोदजीवा बादरनिगोदजीवाश्च, पशब्दी निगोद-18 *जीवतया तुल्यतासूचकी, एवमन्यत्रापि यथायोग परिभावनीयौ । 'सुहमनिगोयजीवा णं भंते' इत्यादि पर्याप्तापर्याप्रविषय पाठसिद्धम्।। सम्प्रति सामान्यतो निगोदसङ्ख्यां जिज्ञासिपुः पृच्छति
निगोदा णं भंते ! दब्वट्ठयाए कि संखेजा असंखेजा अर्णता?, गोयमा! नो संखेजा असंखेजा नो अर्णता, एवं पात्तगावि अपजत्तगावि ॥ सहमनिगोदा णं भंते! दबट्टयाए कि संखेजा असंखेजा अर्णता?, गो०! णो संखेजा असंखेजाणो अर्णता, एवं पजसगावि अपजत्तगावि, एवं बायरावि पजतगावि अपजत्तगावि णो संखेजा असंखेजाणो अणंता॥णिओदजीवा णं भंते! दबट्ठयाए कि संखेजा असंखेजा अर्णता?, गोयमा! नो संखेजा नो असंखेजा अणंता, एवं पजत्तावि अपजत्सावि, एवं सुहमणिओयजीवावि पजत्तगावि अपजत्तगावि, बादरणिओदजीवावि पजत्तगावि अपजत्तगावि ॥ णिओदा णं भंते! पदेसट्टयाए कि संखेज़ा? पुच्छा, गो. यमा! नो संखेजा नो असंखेजा अणंता, एवं पजत्तगावि अपजसगावि । एवं सुहमणिओयावि पजसगावि अपजसगावि य, पएसट्टयाए सब्वे अगंता, एवं वायरनिगोयापि पजत्तयाबि
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