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________________ आगम (१४) [भाग-१७] “जीवाजीवाभिगम" - प्रतिपत्ति : [३], ---------------------- उद्देशक: [(द्वीप-समुद्र)], -------------------- मूलं [१५९] + गाथा पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...आगमसूत्र-[१४], उपांगसूत्र-३] "जीवाजीवाभिगम" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: 4 प्रत सूत्रांक [१५९] श्रीजीवाजीवाभि० मलयगिरीयावृत्तिः प्रतिपत्तौ वेलन्धरा वासादिः 151 उद्देशः२ सू०१५९ 4 2- ॥३०९॥ गाथा E7% आवासपञ्चता पण्णता? गोयमा! चत्तारि आवासपव्यता पण्णता, तंजहा-गोभे उदगभासे संखे दगसीमाए ॥ कहिणं भंते! गोथूभस्म वेलंधरणागरायस्स गोभे णाम आवासपश्यते प. पणते?, गोयमा! जंबूदीचे दीवे मंदरस्स पुरथिमेणं लवणं समुई बायालीसं जोयणसहस्साई ओगाहित्ता एत्य णं गोथूभस्स वेलंधरणागरायस्स गोथूभे णामं आवासपथ्यते पण्णत्ते सत्तरसएकवीसाईजोयणसताई उर्दु उच्चत्तेणं चत्तारि तीसे जोयणसते कोसं च उवेधेणं मूले दसयावीसे जोयणसते आपामविक्खंभेणं मज्झे सत्ततेवीसे जोयणसते उरि चत्तारि चउवीसे जोयणसए आयामविक्खंभेणं मृले तिपिण जोयणसहस्साई दोपिणा य बत्तीसुत्सरे जोयणसए किंचिबिसेसूणे परिक्खेवेणं मजले दो जोयणसहस्साई दोषिण प छलसीते जोधणसने किंचि. विसेसाहिए परिक्खेवेणं उवरि एग जोयणसहस्सं तिपिण य ईयाले जोयणसते किंचिबिसेसणे परिक्खेवेणं मूले विस्थिपणे मज्झे संखित्ते उप्पि तणुए गोपुच्छसंठाणसंठिए सव्यकणगामए अच्छे जाव पडिरूवे ॥ से णं एगाए पउमवरवेदियाए एगेण च वणसंडेणं सवतो समंता संपरिक्खित्ते, दोण्हवि चण्णओ ॥ गोथूभस्स णं आवासपब्बतस्स उपरि बहुसमरमणिजे भूमिभागे पपणत्ते जाव आसयंति ॥ तस्स णं बहुसमरमणि जस्स भूमिभागस्स बहुमजादेसभाए एल्थ एगे महं पासायवटेंसए बावहूँ जोयणद्धं च उई उच्चत्तेणं तं चेव पमाणं अद्ध आयाम दीप 62-% अनुक्रम [२०५-२०६] ॥३०९॥ अत्र मूल-संपादने शिर्षक-स्थाने एका स्खलना वर्तते-द्वीप-समुद्राधिकार: एक एव वर्तते, तत् कारणात् उद्देश:- '२' अत्र २ इति निरर्थकम् ~166~
SR No.035017
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 17 Jivajivabhigam Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages488
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size118 MB
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