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________________ आगम (१३) [भाग-१५] “राजप्रश्नीय” – उपांग सूत्र-२ (मूलं+वृत्तिः ) ---------- मूलं [८१-८२] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [१३], उपांगसूत्र- [२] “राजप्रश्नीय" मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: I श्रीराजपनी मलय गिरी-2 या दृचिः आराधना हमतिज्ञ प्रत ०८१-२ सूत्रांक ॥१४५॥ [८१-८२] में अरहताण जाव संपत्ताण । नमोऽत्थु ण केसिस्स कुमारसमणस्स मम धम्मोवदेसगस्स धम्मायरिपस्स, वदामि गं भगवंत तत्थ मयं इह गए, पास मे भगवं तत्थ गए इह गतिका बंदर ममंसह, पुरिपि ण भए केसिरस कुमारसमणस्स अंतिए थूलपाणाहवाए पचवावाए जाव परिग्गहे, तं इयाणिपि णं तसदेव भावतो अंतिए सतं पाणाइवायं पचक्खामि जाव परिग्गहं सर्व कोहं जाव मिछादसणसालं, अकरणिजं जोय पञ्चकवामि, सौ असणे चउब्विह पि आहारं जाव जीवाए पथक्खामि, जपि य मे सरीरं इ९ जाव फुसंतुत्ति एयपि य णं चरिमेहिं ऊसासनिस्सासेहिं वोसिरामि. तिक आलोइयपडिकते समाहिपत्ते कालमासे कालं किच्चा सोहम्मे कप्पे सूरियामे विमाणे उववापसभाए जाव वण्णो । तए णं से सूरियामे देवे अहणोववन्नए चेव समाणे पंचविहाए पज्जत्तीए पजतिभावं गच्छति, सं०-आहारपजत्तीए सरीरपजत्तीए इंदिपपज्जतीए आगपज्जनीए भासमणपजनीए,तं एवं खलु भो! सरियाभेणं देवेणं सा दिला देविड़ी ३व्वा देवजुली दिवे देवाणुभाये लढे पत्ते अभिसमझागए ॥ (सू०८१)॥ मूरियाभस्स गं भंते ! देव. स्स केवतियं कालं ठिती पण्णता, गोयमा! चवारि पलिओवमाई ठिती पणस्ता,से ण सूरियामे देवे ताओ लोगाओ आउक्वएणं भवक्खएणं ठिडक्वएणं अतर चहना कहिं गमिहिति कहिं उवबचिहिति, गोथमा ! महाविदेहे वासे जाणि इमाणि कुलाणि भवति, तं०-अढाई दिसाई घिउ दीप अनुक्रम [८१-८२] murary.com प्रदेशी राज्ञस्य आगामि भवा: एवं मोक्ष-प्राप्ति: ~299~
SR No.035015
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 15 Rajprashniya Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages314
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_rajprashniya
File Size68 MB
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